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________________ २८२ जीवोंकों अबीतक शस्त्र, नहीं प्रणम्या है, जीव प्रदेशोंकी सत्ता नष्ट नहीं हुई है, अर्थात् वह पाणी अचित्त नहीं हुवा है, ऐसा पाणी साधु प्रहन करे. ३ * (२५२ ) ,, कोइ साधु अपने शरीरको देख, दुनीयाको कहेकि- मेरेमें आचार्यका सर्व लक्षण है. अर्थात् मुझे आचार्यपद दो-ऐसा कहे. ३ भावार्थ-आत्मश्लाघा करनेसे अपनी कीमत कराना है. ( २५३) ,, रागदृष्टि कर गावं, वाजिंत्र बजावे, नटोंकी माफिक नाचे. कूदे, अश्वकी माफिक हणहणाट करे, हस्तीकी माफिक गुलगुलाट करे, सिंहकी माफिक सिंहनाद करे, करावे३ भावार्थ-मुनियोंको ऐसा उन्माद कार्य न करना, किन्तु शांतवृत्ति से मोक्षमार्गका आराधन करना चाहिये. ( २५४),, भेरीका शब्द, पटहका शब्द, मुंहका शब्द, मादलका शब्द, नदीघोषका शब्द. झलरीका शब्द, वल्लरीका शब्द, डमरु, मटूया, शंख, पेटा, गोलरी, और भी श्रोत्रंद्रियको आकर्षित करनेकी अभिलाषा मात्र भी करे. ३ (२५५ ) ,, वीणाका शब्द, त्रिपंचीका शब्द, कूणाका, पापची वीणा, तारकी वीणा, तुबीकी वीणा, सतारका शब्द, ढंकाका शब्द, और भी वीणा-तार आदिका शब्द, श्रोत्रंद्रियको उन्मत्त बनानेवाले शब्द सुननेकी अभिलाषा मात्र करे. ३ ( २५६) ,, ताल शब्द, कांसीतालके शब्द, हस्ततालादि, * एक जातिका धोवण में दुसरी जातीका धोवण मीला देनेसे अगर विस्पर्श होतों त्रसजीवों कि उत्पती हो जाती है ढुंढक भाइयोंकों इसपर ख्याल करना चाहिये. १९
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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