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________________ २७६ (१५) श्री निशिथसूत्र-पंदरहवा उद्देशा... (१) 'जो कोइ साधु साध्वी ' अन्य साधु साध्वी प्रत्ये निष्ठुर वचन बोले. (२) एवं स्नेह रहित कर्कश वचन बोले. (३) कठोर, कर्कश पचन बोले, बोलावे, बोलतेको अच्छा समझे. (४) एवं आशातना करे. ३ भावार्थ-ऐसा बोलनेसे धर्म स्नेहका नाश और क्लेशको वृद्धि होती है. मुनियोंका वचन प्रियकारी, मधुर होना चाहिये. (५) , सचित्त आम्रफल भक्षण करे, ३ (६) एवं सचित्त आम्रफलको चूसे. ३. (७) एवं आम्रफलकी गुटली, आम्रफलके टुकडे (कातळी आम्रफलकी एक शाखा, (डाली) छतु आदिको चूसे. ३ (८) आम्रफलकी पेसी मध्यभागको चूसे. ३ (९) सचित्त आम्र प्रतिबद्ध अर्थात् आम्रफलकी फांकों काटी हुइ, परन्तु अबीतक सचित्त प्रतिबद्ध है, उसको खावे. ३ (१०) एवं उक्त जीव सहितको चूसे. ३ (११) सचित्त जीव प्रतिबद्ध आम्रफल डाला, शाखादि भक्षण करे. ३ (१२) एवं उसे चूसे. ३ भावार्थ-जीव सहित आम्रफलादि भक्षण करनेसे जीव विराधना होती है, हृदय निर्दय हो जाता है. अपने ग्रहन किया हुवा नियमका भंग होते है. (१३) ,, अपने पाव, अन्यतीर्थी, अन्यतीर्थी गृहस्थोंसे
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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