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________________ २६१ निर्जरणा, उजरणा, वापी, पुष्करिणी. दीर्घ वापी, गुजागर वापी, सर (तलाव ), सरपंक्ति-आदि स्थानोंको नेत्रोंसे देखनेकी अभिलाषा करे. ३ भावना पूर्ववत्. (२२),, पर्वतके नदीके पास के काच्छा केलीघर, गुप्तघर, वन- एक जातिका वृक्ष, महान् अटवीका वन, पर्वत-विषम पर्वत. ( २३ ) ग्राम, नगर, खेड, कविठ, मंडप, द्रोणीमुख, पट्टण, सोना-चांदीका आगर, तापसोंका आश्रम, घोषी निवास करनेका स्थान, यावत् सन्निवेश. ( २४ ) ग्रामादिमें किसी प्रकारका महोत्सव हो रहा हो. ( २५ ) ग्रामादिका वध (घात ) हो रहा हो. ( २६ ग्रामादिमें सुन्दर मार्ग बन रहा है, उसे देखनेको जानेका मन भी करे. ३ ( २७ ) ग्रामादिमें दाह ( अग्नि) लगी हो, उसे देखनेकी अभिलाषा मनसे भी करे. ३ (२८) जहां अश्वक्रीडा, गजक्रीडा, यावत् सुवरक्रीडा होती हो. - (२९) जहांपर चौरादिकी घात होती हो. (३०) अश्वका युद्ध, गजयुद्ध, यावत् शूकर युद्ध होता हो. - ( ३१ ) जहांपर बहुत गौ, अश्व, गजादि रहेते हो, ऐसी गौशालादि.. (३२) जहांपर राज्याभिषेकका स्थान है, महोत्सव होता हो, कथा समाप्तका महोत्सव होता हो, मानानुमान-तोल, माप, लंब, चोड जाननेका स्थान, वाजींत्र, नाटक, नृत्य, बीना बजानेका स्थान, ताल, ढोल, मृदंग आदि गाना बजाना होता हो.
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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