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________________ अधिकार चौथा [ भवस्वरूपचिन्ता ] तदेवं निर्दम्भाचरणपटुना चेतसि भवस्वरूपं संचिन्त्यं क्षणमपि समाधाय सुधिया । इयं चिन्ताऽध्यात्मप्रसरसरसीनीरलहरी, सतां वैराग्यास्थाप्रियपवनपीना सुखकृते ॥१॥ भावार्थ : इसलिए दम्भरहित आचरण करने में निपुण और बुद्धिमान पुरुष क्षणभर के लिए मन को स्थिर कर संसार के स्वरूप का चिन्तन करे । संसारस्वरूप का चिन्तन अध्यात्म के विशाल सरोवर की जल- तरङ्ग के समान है, वह वैराग्य की आस्थारूपी मनोहरवायु से परिपुष्ट होकर सत्पुरुषों के लिए सुखदायी होता है ॥१॥ इतः कामौर्वाग्निर्ज्वलति परितो दुःसह इतः । पतन्ति ग्रावाणो विषयगिरिकूटाद्विघटिताः ॥ इतः क्रोधावर्तो विकृतितटिनी - संगमकृतः । समुद्रे संसारे तदिह न भयं कस्य भवति ? ॥२॥ भावार्थ : एक ओर दुःसह कामरूपी वड़वानल चारों तरफ से जल रहा है, दूसरी ओर विषयरूपी पर्वत - शिखर से अधिकार चौथा २९
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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