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________________ ७२ विवेक-चूडामणि क्षुधा-पिपासा आदि छ: ऊर्मियोंसे रहित योगिजन जिसका हृदयमें ध्यान करते हैं, जो इन्द्रियोंसे ग्रहण नहीं किया जा सकता तथा बुद्धिसे अगम्य और स्तुत्य ऐश्वर्यशाली है तुम वही ब्रह्म हो-ऐसी चित्तमें भावना करो। भ्रान्तिकल्पितजगत्कलाश्रयं स्वाश्रयं च सदसद्विलक्षणम्। निष्कलं निरुपमानमृद्धिमद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि॥२५८॥ जो इस भ्रान्ति-कल्पित जगत्रूप कलाका आधार है, स्वयं अपने ही आश्रय स्थित है, सत् और असत् दोनोंसे भिन्न है तथा जो निरवयव, उपमारहित और परम ऐश्वर्यसम्पन्न है, वह परब्रह्म ही तुम हो-ऐसा चित्तमें चिन्तन करो। जन्मवृद्धिपरिणत्यपक्षय व्याधिनाशनविहीनमव्ययम् । विश्वसृष्ट्यवनघातकारणं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५९॥ जो जन्म, वृद्धि (बढ़ना), परिणति (बदलना), अपक्षय, व्याधि और नाश-शरीरके इन छहों विकारोंसे रहित और अविनाशी है तथा विश्वकी सृष्टि, पालन और विनाशका कारण है वह ब्रह्म ही तुम हो-ऐसी अपने मनमें भावना करो। अस्तभेदमनपास्तलक्षणं निस्तरङ्गजलराशिनिश्चलम् । नित्यमुक्तमविभक्तमूर्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६०॥ जो भेदरहित और अपरिणामिस्वरूप है, तरंगहीन जलराशिके समान निश्चल है तथा नित्यमुक्त और विभागरहित है वह ब्रह्म ही तुम होऐसा मनमें विचारो।
SR No.034107
Book TitleVivek Chudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages153
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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