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________________ ४० विवेक-चूडामणि पुरुषका अनात्म-वस्तुओंमें 'अहम्' इस आत्म-बुद्धिका होना ही जन्म-मरणरूपी क्लेशोंकी प्राप्ति करानेवाला अज्ञानसे प्राप्त हुआ बन्धन है; जिसके कारण यह जीव इस असत् शरीरको सत्य समझकर इसमें आत्मबुद्धि हो जानेसे, तन्तुओंसे रेशमके कीड़ेके समान, इसका विषयोंद्वारा पोषण, मार्जन और रक्षण करता रहता है। अतस्मिस्तबुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा। ततोऽनर्थवातो निपतति समादातुरधिकस्ततो योऽसद्ग्राहः स हि भवति बन्धःशृणु सखे॥१४०॥ मूढ पुरुषको तमोगुणके कारण ही अन्यमें अन्य-बुद्धि होती है; विवेक न होनेसे ही रज्जुमें सर्प-बुद्धि होती है; ऐसी बुद्धिवालेको ही नाना प्रकारके अनर्थों का समूह आ घेरता है; अत: हे मित्र! सुन, यह जो असद्ग्राह (असत्को सत्य मानना) है वही बन्धन है। अखण्डनित्याद्वयबोधशक्त्या स्फुरन्तमात्मानमनन्तवैभवम् । समावृणोत्यावृतिशक्तिरेषा । तमोमयी राहुरिवार्कविम्बम्॥१४१॥ अखण्ड, नित्य और अद्वय बोध-शक्तिसे स्फुरित होते हुए अखण्डैश्वर्यसम्पन्न आत्मतत्त्वको यह तमोमयी आवरणशक्ति इस प्रकार ढंक लेती है जैसे सूर्यमण्डलको राहु। तिरोभूते स्वात्मन्यमलतरतेजोवति पुमा ननात्मानं मोहादहमिति शरीरं कलयति। तत: कामक्रोधप्रभृतिभिरमुं बन्धनगुणैः परं विक्षेपाख्या रजस उरुशक्तिर्व्यथयति॥१४२॥ अति निर्मल तेजोमय आत्मतत्त्वके तिरोभूत (अदृश्य) होनेपर पुरुष अनात्मदेहको ही मोहसे 'मैं हूँ' ऐसा मानने लगता है। तब रजोगुणकी
SR No.034107
Book TitleVivek Chudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages153
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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