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________________ ३८ विवेक-चूडामणि अहंकारसे लेकर देहपर्यन्त और सुख आदि समस्त विषय जिस नित्यज्ञानस्वरूपके द्वारा घटके समान जाने जाते हैं। एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्डसुखानुभूतिः । सदैकरूपः प्रतिबोधमात्रो येनेषिता वागसवश्चरन्ति॥१३३॥ यही नित्य अखण्डानन्दानुभवरूप अन्तरात्मा पुराणपुरुष है, जो सदा एकरूप और बोधमात्र है तथा जिसकी प्रेरणासे वागादि इन्द्रियाँ और प्राण चलते हैं। अत्रैव सत्त्वात्मनि धीगुहाया मव्याकृताकाश उरुप्रकाशः। आकाश उच्चै रविवत्प्रकाशते स्वतेजसा विश्वमिदं प्रकाशयन्॥१३४॥ इस सत्त्वात्मा अर्थात् बुद्धिरूप गुहामें स्थित अव्यक्ताकाशके भीतर एक परमप्रकाशमय आकाश सूर्यके समान अपने तेजसे इस सम्पूर्ण जगत्को देदीप्यमान करता हुआ बड़ी तीव्रतासे प्रकाशमान हो रहा है। ज्ञाता मनोऽहङ्कृतिविक्रियाणां देहेन्द्रियप्राणकृतक्रियाणाम् ।। अयोऽग्निवत्ताननुवर्तमानो न चेष्टते नो विकरोति किञ्चन॥१३५॥ वह मन और अहंकाररूप विकारोंका तथा देह, इन्द्रिय और प्राोंकी क्रियाओंका ज्ञाता है। तथा तपाये हुए लोहपिण्डके समान उनका अनुवर्तन करता हुआ भी न कुछ चेष्टा करता है और न विकारको ही प्राप्त होता है। न जायते नो म्रियते न वर्धते न क्षीयते नो विकरोति नित्यः।
SR No.034107
Book TitleVivek Chudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages153
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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