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________________ विवेक-चूडामणि विद्वान्स तस्मा उपसत्तिमीयुषे मुमुक्षवे साधु यथोक्तकारिणे। प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय तत्त्वोपदेशं कृपयैव कुर्यात्॥४४॥ शरणागतिकी इच्छावाले उस मुमुक्षु, आज्ञाकारी, शान्तचित्त, शमादिसंयुक्त साधु शिष्यको गुरु कृपया [ इस प्रकार ] तत्त्वोपदेश करे श्रीगुरुरुवाच मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपाय: संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः । येनैव याता यतयोऽस्य पारं तमेव मार्ग तव निर्दिशामि॥ ४५ ॥ गुरु-हे विद्वन्! तू डर मत, तेरा नाश नहीं होगा। संसार-सागरसे तरनेका उपाय है। जिस मार्गसे यतिजन इसके पार गये हैं, वही मार्ग में तुझे दिखाता हूँ। अस्त्युपायो महान्कश्चित्संसारभयनाशनः । येन तीर्वा भवाम्भोधिं परमानन्दमाप्स्यसि॥४६॥ संसाररूपी भयका नाश करनेवाला कोई एक महान् उपाय है जिसके द्वारा तू संसार-सागरको पार करके परमानन्द प्राप्त करेगा। वेदान्तार्थविचारेण जायते ज्ञानमुत्तमम्। तेनात्यन्तिकसंसारदुःखनाशो भवत्यनु॥४७॥ वेदान्त-वाक्योंके अर्थका विचार करनेसे उत्तम ज्ञान होता है, जिससे फिर संसार-दुःखका आत्यन्तिक नाश हो जाता है। श्रद्धाभक्तिध्यानयोगान्मुमुक्षो र्मुक्तेहेतून्वक्ति साक्षाच्छुतेर्गीः । यो वा एतेष्वेव तिष्ठत्यमुष्य मोक्षोऽविद्याकल्पिताद्देहबन्धात् ॥ ४८ ॥
SR No.034107
Book TitleVivek Chudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages153
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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