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________________ पातालखण्ड ] . देवपुरके राजकुमार रुक्माङ्गदद्वारा अश्वका अपहरण . सुमतिने कहा-स्वामिन् ! वीर पुष्कल श्रेष्ठ अब तुम बलपूर्वक किया हुआ मेरा पराक्रम देखो। अस्त्रोंके ज्ञाता हैं। इस समय ये ही युद्ध करें। नीलरत्न सम्हलकर बैठ जाओ, मैं तुम्हारे रथको आकाशमें आदि दूसरे योद्धा भी संग्राममें कुशल हैं; अतः वे भी उड़ाता हूँ।' ऐसा कहकर उसने मन्त्र पढ़ा और पुष्कलके लड़ सकते हैं। आपको तो भगवान् शङ्कर अथवा राजा रथपर भ्रामकास्त्रका प्रयोग किया। उस बाणसे आहत वीरमणिके साथ ही युद्ध करना चाहिये। वे राजा बड़े होकर पुष्कलका रथ चक्कर काटता हुआ एक योजन दूर बलवान् और पराक्रमी हैं; उन्हें द्वन्द्वयुद्धके द्वारा जीतना जा पड़ा। सारथिने बड़ी कठिनाईसे रथको रोका तो भी चाहिये। इस उपायसे काम लेनेपर आपकी विजय वह पृथ्वीपर ही चक्कर लगाता रहा। किसी तरह होगी। इसके बाद आपको जैसा जंचे, वैसा ही कीजिये; पूर्वस्थानपर रथको ले जाकर उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता क्योंकि आप तो स्वयं ही परम बुद्धिमान् हैं। पुष्कलने कहा-'राजकुमार ! तुम्हारे जैसे वीर पृथ्वीपर मन्त्रीकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका दमन रहनेके योग्य नहीं हैं। तुम्हें तो इन्द्रकी सभामें रहना करनेवाले शत्रुघ्नने युद्धके लिये निश्चय किया और श्रेष्ठ चाहिये, इसलिये अब देवलोकको ही चले जाओ।' योद्धाओंको लड़नेकी आज्ञा दी। संग्रामके लिये उनकी ऐसा कहकर उन्होंने आकाशमें उड़ा देनेवाले महान् आज्ञा सुनकर युद्ध-कुशल वीर अत्यन्त उत्साहसे भर अस्त्रका प्रयोग किया। उस बाणकी चोटसे रुक्माङ्गदका गये और शत्रुसैनिकोंके साथ युद्ध करनेके लिये चले। रथ सीधे आकाशमें उड़ चला और समस्त लोकोंको वे हाथोंमें धनुष धारण किये युद्धके मैदानमें दिखायी लाँघता हुआ सूर्यमण्डलतक जा पहुँचा । वहाँको प्रचण्ड दिये और बाणोंकी बौछार करके बहुतेरे विपक्षी ज्वालासे राजकुमारका रथ घोड़े और सारथिसहित दग्ध योद्धाओंको विदीर्ण करने लगे। उनके द्वारा अपने हो गया तथा वह स्वयं भी सूर्यको किरणोंसे झुलस सैनिकोंका संहार सुनकर मणिमय रथपर बैठा हुआ जानेके कारण बहुत दुःखी हो गया। अन्तमें वह दग्ध बलवान् राजकुमार रुक्माङ्गद उनका सामना करनेके होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय युद्धके अग्रभागमें लिये आगे बढ़ा। उसने अपने अनेकों बाणोंकी मारसे महान् हाहाकार मचा। राजा वीरमणि अपने पुत्रको शत्रुपक्षके हजारों वीरोंको उद्विग्न कर दिया। उनमें मूर्छित देखकर क्रोधमें भर गये और रणभूमिके हाहाकार मच गया। राजकुमार बलवान् था; उसने बल, मध्यभागमें खड़े हुए पुष्कलकी ओर चले। यश और सम्पत्तिमें अपनी समानता रखनेवाले शत्रुघ्न इधर कपिवर हनुमान्जीने जब देखा कि समुद्रके तथा भरत-कुमार पुष्कलको युद्धके लिये ललकारा- समान विशाल सेनाके भीतर स्थित हुए राजा वीरमणि 'वीररत्न ! मुझसे युद्ध करनेके लिये आओ। इन करोड़ों भरतकुमार पुष्कलको ललकार रहे हैं तब वे उनकी ओर मनुष्योंको डराने या मारनेसे क्या लाभ? मेरे साथ घोर दौड़े। उन्हें आते देख पुष्कलने कहा-'महाकपे ! आप संग्राम करके विजय प्राप्त करो।' क्यों युद्धभूमिमें लड़नेके लिये आ रहे हैं? राजा रुक्माङ्गदके ऐसा कहनेपर बलवान् वीर पुष्कल वीरमणिकी यह सेना है ही कितनी ! मैं तो इसे बहुत हँस पड़े। उन्होंने अपने तीखे बाणोंसे राजकुमारकी थोड़ी-अत्यन्त तुच्छ समझता हूँ। जिस प्रकार आपने छातीमें बड़े वेगसे प्रहार किया। राजकुमार शत्रुके इस भगवान् श्रीरामकी कृपासे राक्षस-सेनारूपी समुद्रको पार पराक्रमको नहीं सह सका । उसने अपने महान् धनुषपर किया था, उसी प्रकार मैं भी श्रीरघुनाथजीका स्मरण बाणोंका सन्धान किया और दस सायकोंसे वीर करके इस दुस्तर संकटके पार हो जाऊँगा। जो लोग पुष्कलकी छातीको बींध डाला। दोनों ही युद्धमें एक दुस्तर अवस्थामें पड़कर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हैं, दूसरेपर कुपित थे। दोनोंहीके हृदयमें विजयकी उनका दुःखरूपी समुद्र सूख जाता है-इसमें तनिक भी अभिलाषा थी। रुक्माङ्गदने पुष्कलसे कहा-'वीर ! सन्देह नहीं है; इसलिये महावीर ! आप चाचा शत्रुघ्नके
SR No.034102
Book TitleSankshipta Padma Puran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages1001
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size73 MB
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