SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 265
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 3 गुणव्रत :- दिशापरिमाण, भोगोपभोगपरिमाण, - अनर्थदण्ड विरमण / 4 शिक्षाव्रत :- सामायिक, देशावकाशिक, पौषध, और अतिथि संविभाग / 1. अणुव्रत :- स्थूल अहिंसा : स्थूल प्राणातिपात विरमण :- "हिलते-डुलते निर्दोष त्रस जीव को जानबूझकर निरपेक्षता से नहीं मारूं"यह प्रतिज्ञा | इसको विशुद्ध रूप से पालन करने के लिए जहां तक संभव हो जीव पर प्रहार, उसका अंग-छेद, दृढ़ बंधन, उसे दागना, अति भारारोपण, भोजन-पानी में विलम्ब, विच्छेद नहीं करना चाहिए / प्रतिज्ञा में कभी रोग की स्थिति में जुलाब आदि लेना पड़े और उसमें जीव मरे तो उसकी यतना (संतप्त हृदय से अपवाद) / 2. अणुव्रत : स्थूल सत्य : स्थूल मृषावाद-विरमण :- 1. कन्या आदि मनुष्य के विषय में, 2. पशु के विषय में, 3. जमीन मकान के विषय में, माल के विषय में झूठ नहीं बोलूं / 4. दूसरे की धरोहर से इन्कार न करूं, उसे हड़प न कर लूं, तथा झूठी गवाही न दूं, (दाक्षिण्य में यतना) 'ऐसी प्रतिज्ञा / इसके शुद्ध पालन के लिए सहसा (बिना विचार किए) नहीं बोलना / पत्नी, मित्र आदि की गुप्त बातें किसी से भी 22 2600
SR No.032824
Book TitleJain Dharm Ka Parichay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvanbhanusuri
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year2014
Total Pages360
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy