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________________ नैषधीयचरिते को निन्दा-भरे ) थोड़े से ही कथन से, अप्रिय वाणी द्वारा ( क्रोध से ) जलते हुए कामदेव के 'शोषण' बाण की चोट-से जैसे शीघ्र ही ( सूखकर ) धूलियुक्त हो उठा / / 100 / / टिप्पणी-प्यासे व्यक्ति को यदि पीने को जल न मिले, उसके मुख का सूख जाना स्वाभाविक ही है / इस पर कवि ने कल्पना की है कि मानो कामदेव के 'शोषण' बाण के प्रहार से मुख सूख गया हो। इस तरह यहाँ उत्प्रेक्षा है। 'धूलियुक्त' शब्द यहाँ सूखने अर्थ में लाक्षणिक है / सुखे चेहरे को देखकर लोग 'क्यों चेहरे पर धूल उड़ रही है ?' इस तरह कहते ही हैं। शब्दालंकार वृत्त्यनुप्रास है। प्रियसखीनिवहेन सहाथ सा व्यरचय गिरमर्धसमस्यया / हृदयमर्मणि मन्मथसायकैः क्षततमा बहु भाषितुमक्षमा // 101 // अन्वयः-अथ हृदय-मर्मणि मन्मथसायकैः क्षततमा ( अतएव ) बहु भाषितुम् अक्षमा सा प्रिय. सखी-निवहेन सह अर्ध-समस्यया गिरम् व्यरचयत् / टीका-अथ अनन्तरम् हृदयम् स्वान्तम् एव मर्म प्राप्णधारकस्थानम् ( कर्मधा० ) तस्मिन् मन्मथस्य कामदेवस्य सायकैः शरैः अतिशयेन क्षतेति क्षततमा भृशं विद्धा (प्रादि स०), अतएव बहु अधिक भाषितुम् वक्तम् अक्षमा असमर्था सा दममन्तो प्रियाश्च ताः सख्यः स्वरहस्यवेदिन्यः स्निग्धा आलयः ( कर्मधा० ) तासो निवहेन समूहेन सह सार्धम् अर्धा अपूर्ण या समस्या समासार्थ-वाक्यम् ( 'समस्या तु समासार्था' इत्यमरः ) तया ( कर्मधा० ) गिरम् वाणीम् म्यरचयत् रचितवती कस्यापि वस्तुनः सखीवाक्ये संकेतं गृहीत्वा तत्पूरकवाक्यमुत्तररूपेण कथयति स्मेति भावः / / 101 // ब्याकरण-मन्मथः इसके लिए पीछे श्लोक 98 का व्याकरण-स्तम्भ देखिए / सायक: स्यतीति /सो (अन्तकर्मणि ) ण्वुल् ( कर्तरि ) / क्षततमा-क्षत+तमम् / प्रक्षमा न क्षमेति / क्षम्+अच् ( कर्तरि ) / समस्या 'अपूर्णत्वात् विक्षिप्तं (विवक्षितम् ) समस्यते संक्षिप्यतेऽनया समस्या, 'संशयां समजे'ति बाहुलकात् ( सम् +/अस्+ ) क्यप्' इति क्षीरस्वामी। अनुवाद-तत्पश्चात् भन्मथ के बाणों से हृदय-रूप मर्म-स्थल में बुरी तरह वींधी, (अतएव ) अधिक बोलने में असमर्थ बनी वह ( दमयन्ती) प्रिय सखी-गण के साथ आधी समस्या (-पूर्ति) द्वारा बोली / / 101 // टिप्पखी-अधिक बोलने में अशक्त हुई दममन्ती अपनी सखियों के साथ समस्यापूर्ति के रूप में बातचीत करने लगी। आंशिक रूप में सखियाँ श्लोक का पूर्वाध कहती तो वह पूरक-रूप में उत्तरार्ध में उत्तर देती थी। यहाँ विद्याधर ने सहोक्ति अलंकार कहा है लेकिन सहोक्ति यहाँ इसलिए नहीं बन सकती है कि उसके मूल में अतिशयोक्ति नहीं है। केवल 'सह' शब्द होने मात्र से 'सीता रामेष सह वनं गता' की तरह सहोक्ति नहीं होती है। न बोल सकने का कारण बताने से काम्यनि अवश्य है / शब्दालंकर वृत्त्यनुपास है।
SR No.032784
Book TitleNaishadhiya Charitam 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMohandev Pant
PublisherMotilal Banarsidass
Publication Year
Total Pages402
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size28 MB
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