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________________ कापरड़ा तीर्थ । सहित फलवृद्धि चतुर्मास रहे थे । इससे अनुमान होता है कि फलोधी नगरमें उस समय हजारों घर जैनियों के होंगे। उक्त सूरीश्वरजी के करकमलों से गरुड जाति के पार्श्व श्रेष्टिने उसी वर्ष इस मन्दिर की प्रतिष्टा करवाई । शेष कार्य नागौर के श्रीमानोंने करवाया । वि. सं. १२०४ में आचार्य वादी देवसूरि से पुनः यह मन्दिर प्रतिष्टित हुआ । प्रतिवर्ष यहाँ आश्विन कृष्ण १० मी का बड़ा मेला भरता है। . ९ मेड़ता-यह भी प्राचीन नगर है। यहाँ जैनों की हजारों घरों की बस्ती थी जिसके स्मारक भव्य और मनोहर १४ मन्दिर आज भी विद्यमान हैं । एक बावन जिनालय मन्दिर तोड़ कर मुसलमानोंने अपनी मसजिद बनाली है । १० नारदपुरी-इसे अब नाडोल कहते हैं । जहाँ महा राजा सम्प्रति का कराया हुआ श्री पद्मप्रभु का मन्दिर है। यहा का श्री नेमिनाथ भगवान् का मन्दिर उससे भी पुराना है। आचार्य मानदेव मूरिने यहाँ लघु शांति की रचना की थी जिससे शाकम्भरी ( शांभर ) के संघ के उपसर्ग को शांत किया था । नाडोल के राव लाखण के अनुज राव दुद्धजी को भाचार्य श्री यशोदेवसूरिने प्रतिबोध दे जैन बनाए । दुद्धजी की संतान आज भंडारी खांप के नाम से लोक प्रसिद्ध है। .. ११ नाडुलाई यहाँ शत्रुञ्जय और गिरनार नामकी दो छोटी पहाडियों हैं । भाचार्य यशोदेवसूरि अपने विद्याबल से
SR No.032646
Book TitlePrachin Tirth Kapardaji ka Sachitra Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherJain Aetihasik Gyanbhandar
Publication Year1932
Total Pages74
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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