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साधन प्रकरण सब निर्वाण हो जाता है, ज्ञान-शेय-ज्ञाता कुछ भी रहता नहीं, जो मूल है केवल वही रहता है; इसीको ही कैवल्य वा मुक्ति कहते हैं । यही योगशास्त्रका संक्षेप विवरण है। ___ मेरुदण्ड और मस्तिष्क ही योगीके आश्रय हैं। यही योगमार्ग भी हैं। यह मार्ग कैसा है और इसका बनावट कैसा, वही संक्षेपमें नीचे लिखा गया है, और समझने और समझानेके सुभीतेके लिये कुछ चित्र भी दिये गये हैं।
मेरुदण्ड खोखला है। मस्तिष्क जिस उपादानसे बना है, वह खोखला भी उसी उपादानसे परिपूर्ण है। उस उपादानके ठीक बीच में से एक छिद्र युक्त नाड़ी बराबर गुह्यदेशसे मस्तिष्क तक फैली है; उस नाडीको सुषुम्ना कहते हैं। उस खोखलेके भीतर उसी उपादान से निर्मित्त एकके बाद एक करके
१म चित्र कई एक पद्म हैं । गुह्यसंलग्नस्थल में चार दल-विशिष्ट एक पद्म है, उसको मूलाधाधर कहते हैं; लिङ्गमूलके ठीक सीधे स्थानमें छः दलविशिष्ट स्वाधिष्ठान नामका एक पद्म है; नाभिमूलके ठीक सीधे स्थानमें दश दल-विशिष्ट मणिपुर नामसे एक पद्म है; हृदय (अर्थात् दोनों स्तनके ठीक बीच) के ठीक सीधे स्थानमें द्वादश दल-विशिष्ट अनाहत नामक पद्म हैं; कण्ठमूल के ठीक सीधे स्थानमें सोलह दल
इड़ा.......... पिङ्गला......
सुषुम्ना .......