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________________ जैनधर्म का महान् प्रचारक-सम्राट सम्प्रति मौर्य राजाओंमें सम्राट चन्द्रगुप्त और सम्प्रति दोनों ही जैनधर्मके महान् प्रचारक हुए हैं। बौद्ध धर्मके प्रचारमें जो स्थान अशोकको प्राप्त है, जैनधर्म के प्रचार और प्रसारमें वही स्थान सम्प्रतिका है । सम्प्रतिकी जीवन गाथाके सम्बन्धमें हेमचन्द्रने अपने परिशिष्ट पर्वमें लिखा है कि बिन्दुसारकी मृत्यु के पश्चात् अशोक राज्यासीन हुआ। अशोकके लाडिले पुत्रका नाम कुणाल था। सम्राट अशोकको सर्वदा यह चिन्ता बनी रहती थी कि कहीं ऐसा न हो कि विमाता तिष्यरक्षिता कुमार कुणालके जीवनको खतरेमें डाल दे तथा वह अपने षड्यन्त्र द्वारा अपने पुत्रको राज्याधिकारी न बना दे। अतः अशोकने कुणालको उज्जयिनीमें अपने भाईके संरक्षणमें रखा । जब कुणाल आठ वर्षका हो गया तो रक्षक पुरुषोंने राजा अशोकको सुचमा मा दी कि कुमार अब विद्याध्ययन करने के योग्य हो गया है। सम्राट अशोक इस समाचारको सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और अपने हाथसे कुमारको विद्याध्ययन करानेका आदेश सूचक पत्र लिखा। पत्र समाप्त करनेके पश्चात् सीलमुहर करनेसे पहले ही अशोक किसी आवश्यक कार्यसे बाहर चला गया। इधर रानी तिष्यरक्षिता वहाँ आ पहँची और उसने उस पत्रको पढ़ा। पढ़कर अपने मनोवांछित कार्यको पूरा करनेके लिए "कुमारो अधीयउ" के स्थान पर अपनी आँखके काजलसे एक अनुस्वार बढ़ाकर 'कुमारो अंधीयउ' बना दिया । आवश्यक कार्यसे लौटकर अशोकने पत्र बिना ही पढ़े बन्द कर दूत (पत्रवाहक) को दे दिया। उज्जयिनीमें पत्रवाहकने जब पत्र दिया और उसे खोलकर पढ़ा गया तो वहाँ शोक छा गया। कुमार कुणालके अभिभावक महाराज अशोकके भाईने तत्काल समझ लिया कि यह राजकीय विवादका परिणाम है। परन्तु पितृ-भक्त कुणालने विचार किया कि पिताने मुझे अन्धा होनेके लिए लिखा है, यदि मैं पिताकी आज्ञाका पालन नहीं करता हूँ तो मुझसे बड़ा मौर्यवंशमें पातकी कौन होगा। अतः उसने आगमें गर्मकर लोहेकी सलाइयोंसे अपनी दोनों आँखें फोड़ डालीं और वह स्वयं सदाके लिए अन्धा बन गया। पत्रवाहकके वापस आने पर इस दुःखद समाचारने पाटलीपुत्रमें तहलका मचा दिया। सम्राट अशोक भी प्रिय पुत्रके अन्धे हो जानेसे बहुत दुखी हुआ तथा अपने प्रमाद पर उसे बहुत पश्चात्ताप हुआ। ___ अन्धा हो जानेसे कुणालका राज्य-गद्दी पर अधिकार न रहा। अशोकने उसे जीविका सम्पन्न करनेके लिए उज्जयिनीके आस-पासके कुछ गाँव दे दिये । कुणालको कुछ दिनके पश्चात् सर्वलक्षण सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्रोत्पत्तिका समाचार सुनकर कुणालको बहुत प्रसन्नता हुई और उसने अपनी सौतेली मातासे बदला लेनेत्रा विचार किया। कुणाल संगीत विद्यामें बहुत निपुण था, उसके संगीतकी मधुर लहर जड़-चेतन सभीको आनन्दविभोर करती थी। अतएव वह पाटलीपुत्रमें गया और वहाँ संगीत द्वारा सारे नगरको अपने अधीन कर लिया। अन्धे गायककी प्रशंसा राजमहलों तक पहुँची, राजा अशोकने भी पर्देकी ओटसे गाना सुना । कुणालने मधुर कंठसे अमृत उड़ेलते हुए कहा
SR No.032458
Book TitleBharatiya Sanskriti Ke Vikas Me Jain Vangamay Ka Avdan Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri, Rajaram Jain, Devendrakumar Shastri
PublisherPrachya Shraman Bharati
Publication Year2003
Total Pages478
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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