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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः, अनुवाद - वे अन्य दर्शनों में आस्थावान जन संधि को नहीं जानते । कर्म करने में उद्यत होते हैं, उन्हें धर्म के तत्त्वों का बोध नहीं होता । इस कारण वे संसार सागर को पार नहीं कर सकते । ते णावि संधिं णच्चा णं न ते धम्मविओ जणा । जे ते उ, वाइणो एवं न ते गब्भस्स पारगा ॥२२॥ छाया - ते नाऽपि संधिं ज्ञात्वा, नते धर्मविदोजनाः । ये ते तु वादिन एवं न ते गर्भस्य पारगा ॥ अनुवाद - वे इतर सिद्धान्त वादी आत्मा और कर्म की संधि या कर्मबन्ध की प्रक्रिया को नहीं समझते। वे धर्म का रहस्य नहीं जानते । वे मिथ्यावादी है-मिथ्यावाद में विश्वास करते हैं । वे गर्भ को-पुनः पुनः संसार में जन्म मरण या आवागमन की परम्परा को लांघ नहीं सकते । ते णावि संधिं णच्चा णं, न ते धम्मविओ जणा । जे ते उ वाइणो एवं, न ते जम्मस्स पारगा ॥२३॥ छाया - ते नापि संधिं ज्ञात्वा, न ते धर्मविदोजनाः । ये ते तु वादिन एवं न ते जन्मनः पारगाः ॥ अनुवाद - वे अन्य सिद्धान्तवादी कर्म संधान को नहीं समझते, धर्म के स्वरूप का उन्हें बोध नहीं होता वे असत्य सिद्धान्त का निरूपण करते हैं वे जन्म को लांघ नहीं पाते । उन्हें पुनः पुनः जन्म लेना पड़ता ते णावि संधिं णच्चा णं न ते धम्मविओ जणा । जे ते उ वाइणो एवं न ते दुक्खस्स पारगा ॥२४॥ छाया - ते नाऽपि सन्धिं ज्ञात्वा, न ते धर्मविदो जनाः । ये ते तु वादिन एवं न ते दुःखस्य पारगाः ॥ अनुवाद - वे पूर्वोक्त इतरवादी संधि को नहीं जानते । धर्म तत्त्व का उन्हें अवबोध नहीं होता। वे पूर्वोक्त रूप में मिथ्या तत्त्वों का प्रतिपादन करते हैं । वे दुःख को लांघ नहीं सकते । उन्हें बार बार दुःख में पड़ना होता है। ते णावि संधिं णच्चा णं न ते धम्मविओ जणा। । जे ते उ वाइणो एवं न ते मारस्स पारगा ॥२५॥ -53D
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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