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________________ - श्री याताथ्याध्ययनं तीर्थिकतिरस्कारप्रायं वचो ब्रूयात्, स च तीर्थिकस्तद्वचः 'अश्रद्दधानः' अरोचयन्नप्रतिपद्यमानोऽतिकटुकं भावयन् 'क्षुद्रत्वमपि गच्छेद्' तद्विरुपमपि कुर्यात् पालकपुरोहितवत् स्कन्दकाचार्यस्येति । क्षुद्रत्वगमनमेव दर्शयतिस निन्दावचनकुपितो वक्तुर्यदायुस्तस्यायुषो व्याघातरूपं परिपेक्षस्वभावं कालातिचारं-दीर्घस्थितिकमप्यायुःसंवर्तयेत्, एतदुक्तं भवति-धर्मदेशना हि पुरुष विशेष ज्ञात्वा विधेया, तद्यथा-कोऽयं पुरुषो राजादिः ? कं च देवताविशेष नतः ? कतरद्वा दर्शनयाश्रितोऽभिगृहीतोऽनभिगृहीतो वाऽयमित्येवं सम्यक् परिज्ञाय यथार्ह धर्मदेशना विधेया, यश्चैतबुवा किञ्चिद्धर्मदेशनाद्वारेण पर विरोधकृद्धचो ब्रूयात् स परस्मादैहिकामुष्मिकयोमरणादिकमपकारं प्राप्नुयादिति, यत एवं ततो लब्धमनुमानं येन पराभिप्राय परिज्ञाने स लब्धानुमानः 'परेषु प्रतिपाद्येषु यथायोगं यथाहप्रतिपत्त्या 'अर्थान्' सद्धर्मप्ररूपणादिकान् जीवादीन् वा स्वपरोपकाराय ब्रूयादिति ॥२०॥ अपि च - टीकार्थ - जो कुतीर्थिकों से प्रभावित है, अपने सिद्धान्तों में आग्रहयुक्त है । ऐसे मिथ्यादृष्टि पुरुष की अन्त:करणवृत्ति-अन्तरभावना दुष्ट-दूषित होती है उसे अपनी बुद्धि द्वारा पर्यालोचित कर समझे बिना कोई साधु अथवा श्रावक अपने धर्म की स्थापना की इच्छा से-अपना धर्म समझाने की भावना से कुतीर्थिकों को अपमानपूर्ण वचन कहता है तो वह उस साधु या श्रावकं के कथन में श्रद्धा न करता हुआ, अरुचि दिखाता हुआ उसके वचन को अत्यंत कठोर मानकर क्रोध आदि ओछेपन तक पहुंच सकता है । क्रोधवश उस साधु को विरुप-अंक विहीन, क्षत-विक्षत भी कर सकता है । जैसे स्कन्दाचार्य को पालक पुरोहित ने कर डाला था । वह किस प्रकार क्षुद्रत्व तक पहुंच सकता है । इसका दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं । वह पुरुष अपने धर्म के विषय में कहे गये निन्दा युक्त वचन से क्रुद्ध होकर उस साधु के दीर्घ स्थिति युक्त-लम्बे आयुष्य का संवरण-विनाश भी कर सकता है-जान भी ले सकता है । कहने का अभिप्राय यह है कि पुरुष विशेष को जानकर-व्यक्ति को पहचान कर धर्म देशना-धर्म शिक्षा देनी चाहिये । जैसे यह राजा आदि पुरुष जिसे उपदेश देना है कौन है ? यह किस देव के प्रति भक्तिमान है ? किस दर्शन में आस्थाशील है ? तथा यह किस मत में अभिगृहीत-आग्रहयुक्त है ? अनभिगृहीत-आग्रहशून्य है ? यह भली भांति परिज्ञात कर जैसा योग्य हो धर्म देशना देनी चाहिये । जो यह न जानकर धर्म देशना के अन्तर्गत ऐसा वचन बोलता है जिसमें दूसरे का विरोध हो तो वह दूसरा व्यक्ति उसके प्राण तक ले सकता है या ऐसा अपकार कर सकता है जिससे उपदेश वाले साधु या श्रावक को यह लोक या परलोक दोनों अपकृत हो जाते हैं-बिगड़ जाते हैं । इसलिये अनुम द्वारा दूसरे के भाव को परिज्ञात कर जिस प्रकार उचित हो उस प्रकार सद्धर्म के प्रतिपालक सिद्धान्तों काजीवादि तत्त्वों का अपने और अन्य के उपकार हेतु निरूपण करना चाहिये । कम्मं च छंदं च विगिंच धीरे, विणइज्ज उ सव्वओ (हा) आयभावं । रूवेहिं लुप्पंति भयावहे हिं, विजं गहाया तसथावरेहिं ॥२१॥ छाया - कर्म च छन्दश्च विवेचयेद्धीरः विनयेत्तु सर्वत आत्मभावम् । रूपैलृप्यन्ते भयावहैः विद्वान् गृहीत्वा सस्थावरेभ्यः ॥ - अनुवाद - धीर पुरुष जिन्हें धर्म देशना देनी हो, उनके कर्म एवं भाव को समझ कर उपदेश दे । उनके मिथ्यात्व का नाश करे । उन्हें समझाए कि रूप-नारी सौंदर्यादि भयप्रद है । जो उनमें लुब्ध रहता हैलोलुप रहता है, वह विनाश प्राप्त करता है । इसलिये ज्ञानी पुरुष दूसरों के अभिप्राय को समझ कर उ. वैसा उपदेश दे जिससे जंगम एवं स्थावर प्राणियों का हित सधे । 563
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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