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## The Sutra Kritanga Sutra The great souls who are free from greed, what are they like? The Sutrakar reveals that they are free from attachment, or have very little attachment, or attachment that is almost non-existent. They know the joys and sorrows of the beings of the five-astakaya world, in their past, present, and future lives, as they truly are, without any distortion. They do not see things in a distorted way, like the Vibhangajnanis. The Agamas say: "Bante! A man who is attached to Maya and has a false vision, who has renounced the world and lives in the city of Rajagriha, does he know the forms of the city of Varanasi, the material objects, or does he see them?" The answer is: "He sees them, but he sees them with some distortion." And so on. But those who know the past, present, and future, the direct knowers, the Kevala-Jnani, and the fourteen-previous-life-knowers, the indirect knowers, lead the Bhavyas, who desire to cross the cycle of birth and death, towards liberation. They give them good advice. They are self-enlightened. Therefore, no one else can enlighten them. That is, no one else guides them. In terms of attaining what is beneficial and avoiding what is harmful, no one else is their leader or guide. They are self-enlightened, Tirthankaras, Ganadharas, etc., who end the karmas that are the cause of the cycle of birth and death. Here, the word "hu" is used in the sense of the word "cha" or as an adjective, as has been explained before. As long as these great souls do not end the cycle of birth and death, the Sutrakar says that they show them what they should not do. They do not do it, nor do they cause it to be done, being disgusted by the fear of harming beings. The wise, who are always vigilant, avoid wrong conduct, and some become wise through knowledge. **Commentary:** The direct knowers and indirect knowers, who are worthy of being known, are disgusted by the sinful karma of harming beings, and therefore they do not do it themselves, nor do they cause it to be done by others. They do not even approve of others doing it. Similarly, they do not themselves speak falsehoods, nor do they cause others to speak falsehoods, nor do they approve of others speaking falsehoods. And so on, with all the other great vows. Therefore, "always" means at all times.
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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् त्यादि, ते चातीतानागत वर्तमानज्ञानिन: प्रत्यक्षजानिनश्चतुर्दशपूर्वविदो वा परोक्ष ज्ञानिनः' अन्येषां 'संसारोत्तितीर्षूणां भव्यार्ना मोक्षं प्रति नेतारः सदुपदेशं वा प्रत्युपदेष्टारो भवन्ति, न च ते स्वयम्बुद्धत्वादन्येन नीयन्ते ( धवन्तः क्रिय) न्त इत्यनन्यनेयाः, हिताहितप्राप्तिपरिहारं प्रति नान्यस्तेषां नेता विद्यतइति भावः । ते च 'बुद्धाः 'स्वयंबुद्धास्तीर्थकरगणधरादयः, हुशब्दश्चशब्दार्थे विशेषणे वा तथा च प्रदर्शित एव, ते च भवान्तकराः संसारोपादानभूतस्य वा कर्मणोऽन्तकरा भवन्तीति ॥ १६ ॥ यावदद्यापि भवान्तं न कुर्वन्ति तावत्प्रतिषेध्यमंश दर्शयितुमाह टीकार्थ - जो महापुरुष लोभ से अतीत हैं वे किस प्रकार के होते हैं सूत्रकार यह प्रकट करते हैंवे वीतराग होते हैं अथवा अल्प कषाय-अतिन्यून कषाय युक्त होते हैं। वे पंचास्तिकायात्मक लोक के प्राणियों पूर्व जन्म के, वर्तमान के एवं भविष्य के सुखों एवं दुःखों को यथावस्थित रूप में-ज्यों के त्यों सत्य - सत्य जानते हैं । विभंग ज्ञानी की ज्यों विपरीत रूप में नहीं देखते। आगम में कहा है- भंते! मायायुक्त मिथ्या दृष्टि अणगार-गृह त्यागी पुरुष राजगृह नगर में अवस्थित होता हुआ, क्या वाराणसी नगरी के रूपों को मूर्त पदार्थों को जानता है या देखता है ? उत्तर में कहा जाता है कि देखता तो है किंतु कुछ विपर्यास के साथ देखता है इत्यादि । किन्तु अतीत, अनागत और वर्तमान के वेत्ता, प्रत्यक्ष ज्ञानी, केवल ज्ञानी तथा चतुर्दश पूर्वधर परोक्ष ज्ञानी संसार को पार करने के इच्छुक भव्य जीवों को मोक्ष की ओर ले जाते हैं । उन्हें सदुपदेश देते हैं । वे स्वयं बुद्ध होते हैं । इसलिये किसी अन्य द्वारा उन्हें तत्त्वावबोध नहीं कराया जाता । अर्थात् अन्य किसी के द्वारा उन्हें मार्गदर्शन नहीं दिया जाता । हित की प्राप्ति और अहित की निवृत्ति के संदर्भ में कोई दूसरा उनका नेता-मार्गदर्शक नहीं होता । वे स्वयं बुद्ध तीर्थंकर, गणधर आदि भव का संसार के उपादान कारण रूप कर्मों का अन्त - नाश करने वाले होते हैं। यहां 'हु' शब्द 'च' शब्द के अर्थ में या विशेषण के अर्थ में आया है जो पहले बताया जा चुका है I जब तक वे महापुरुष भव का अंत नहीं करते मोक्ष प्राप्त नहीं करते तब तक वे उन्हें जो नहीं करना चाहिये, उसका दिग्दर्शन कराने हेतु सूत्रकार कहते हैं । ते व कुव्वंति ण कारवंति, भूताहिसंकाइ दुर्गुछमाणा । सया जता विप्पणमंति धीरा, विण्णत्ति (ण्णाय) धीरा य हवंतिएगे ॥१७॥ छाया - नैव कुर्वन्ति न कारयन्ति, भूताभिशङ्कया जुगुप्समानाः । सदायताः विप्रणमन्ति धीराः, विज्ञप्तिधीराश्च भवन्त्येके ॥ अनुवाद - प्राणियों की हिंसा से घृणा करने वाले तीर्थंकर एवं गणधर आदि महापुरुष न स्वयं हिंसा आदि करते हैं और न औरों द्वारा करवाते हैं। विज्ञप्ति धीर - प्रज्ञाशील एवं आत्म पराक्रमी - संयम पालन में समुद्यत वे असद् अनुष्ठान से निवृत्तरहतेहुए संयम का अनुशीलन करते हैं। जबकि अन्य दर्शनवादी मात्र ज्ञान से ही अपने आपको पराक्रमी सिद्ध करने का प्रदर्शन करते हैं, कर्म द्वारा नहीं । टीका – ‘ते’ प्रत्यक्षज्ञानिनः परोक्षज्ञानिनो वा विदितवेद्याः सावद्यमनुष्ठानं भूतोपमर्दाभिशङ्कया पापं कर्म जुगुप्समानाः सन्तो न स्वतः कुर्वन्ति, नाप्यन्येन कारयन्ति, कुर्वन्तमप्यपरं नानुमन्यन्ते । तथा स्वतो न मृषावादं जल्पन्ति नान्येन जल्पयन्ति नाप्यपरं जल्पन्तमनुजानन्ति एवमन्यान्यपि महाव्रतान्यायोज्यानीति । तदेवं 'सदा' सर्वकालं 522
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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