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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् होता है, उसे पर्यंक या पलंग कहते हैं । गृहस्थ के घर के भीतर या दो घरों के बीच के संकड़े स्थान में शयन करना या बैठना संयम की विराधना का हेतु है। अतः साधु इनका परित्याग करे । कहा गया है-गम्भीरमांचे या खाट आदि आसनों में गम्भीर - गहरे छिद्र होते हैं, इसलिए उनमें जीव साक्षात् दिखलाई नहीं पड़ते, पर उनमें उनका होना आशंकित है । उनका प्रतिलेखन नहीं हो सकता तथा गृहस्थ के घर के भीतर या दो घरों के बीच स्थित होने से ब्रह्मचर्य की गुप्ति - रक्षा संभव नहीं है । वहाँ स्त्री संसर्ग की भी शंका बनी रहती है । गृहस्थ के घर के परिवार के कुशल क्षेम विषयक समाचार पूछना, अपनी देह के अंगों को पोंछना तथा पहले की हुई क्रीड़ाओं - भोगे हुए विषय भोगों को याद करना - ये सब अनर्थ के, आत्मा के अध: पतन के लिए हैं । अतएव विदित वैद्य-वस्तुतत्ववेत्ता विवेकशील मुनि ज्ञपरिज्ञा द्वारा इन सबको जानकर प्रत्याख्यान परिज्ञा द्वारा इनका परित्याग करे ॥२१॥ वंदपूयणा । जसं कितिं सलोयं च, जा सव्वलोयंसि जे कामा, तं विज्जं परिजाणिया ॥२२॥ छाया यशः कीर्तिः श्लोकश्च या च वन्दना पूजना । सर्वलोके ये कामा स्तद् विद्वान् परिजानीयात् ॥ अनुवाद - यशस्विता, कीर्ति, प्रशस्ति, वन्दन, सत्कार तथा समस्त सांसारिक भोग संसार भ्रमण के कारण हैं, यह जानकर विवेकशील मुनि इनका त्याग कर दे । टीका - अपिच बहुसमरसङ्घट्टनिर्वहणशौर्यलक्षणं यशः दानसाध्या कीर्ति: जातितपोवाहुश्रुत्यादिजनिताश्लाघा, तथा या च सुरासुराधिपतिचक्रवर्तिबलदेववासुदेवादिभिर्वन्दना तथा तैरेव सत्कारपूर्विका वस्त्रादिना पूजना तथा सर्वस्मिन्नापि लोके इच्छामदनरूपा ये केचन कामास्तदेतत्सर्वं यशः कीर्ति (श्लोकादिक :) मपकारितया परिज्ञाय परिहरेदिति ॥२२॥ टीकार्थ बहुत बड़े संग्राम में युद्ध कर विजय प्राप्त करने से संसार में जो शौर्य की प्रसिद्धि या ख्याति होती है, उसे यश कहते हैं । अत्यधिक दान देने की जो प्रसिद्धि प्राप्त होती है, उसे कीर्ति कहा जाता है । उच्च जाति में जन्मने, तपश्वचरण करने तथा शास्त्राध्ययन करने से जो जगत में ख्याति मिलती है उसे श्लाघा कहते हैं । देवेन्द्र, असुरेन्द्र, चक्रवती, बलदेव, वासुदेव आदि द्वारा जो वन्दन नमस्कार, वस्त्रादि द्वारा सत्कार एवं सम्मान किया जाता है, वह तथा समग्र लोक के कामभोग-इन सभी की यश, कीर्ति, प्रशस्ति आदि को परिज्ञात कर - इनके वास्तविक स्वरूप को आत्मसात् कर साधु इनका परित्याग करे । जेणेहं णिव्वहे भिक्खू, अन्नपाणं तहाविहं । अणुप्पयाणमन्नेसिं, येनेह निर्वहेद् भिक्षु रन्नपानं तथाविधम् । अनुप्रदान मन्येषां तद् विद्वान् परिजानीयात् ॥ 430 छाया - तं विज्जं परिजाणिया ॥२३॥ ❀❀
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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