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________________ । कुशील परिज्ञाध्ययनं उदगेण जे सिद्धिमुदाहरंति, सायं च पायं उदगं फुसंता । उदगस्स फासेण सिया य सिद्धी, सिज्झिंसु पाणा बहवे दगंसि ॥१४॥ छाया - उदकेन ये सिद्धि मुदाहरन्ति, सायञ्च प्रातरुदकं स्पृशन्तः । उदकस्य स्पर्शेन स्याच्च सिद्धिः, सिध्येयुः प्राणाः बहव उदके ॥ अनुवाद - कई ऐसा बतलाते हैं कि प्रातः सायं जल स्पर्श करने से मुक्ति प्राप्त होती है, वे मिथ्यावादी हैं । यदि जल स्पर्श या पानी छूने से ही मोक्ष प्राप्त होता हो तो पानी में रहने वाले बहुत से प्राणियों को भी सिद्धि-मुक्ति प्राप्त होनी चाहिए । ___टीका - तथा ये केचन मूढा 'उदकेन' शीतवारिणा' सिद्धिं' परलोकम् 'उदाहरन्ति' प्रतिपादयन्ति 'सायम्' अपराह्ने विकाले वा 'प्रातश्च' प्रत्युषसि च आद्यन्तग्रहणात् मध्यान्ते च तदेवं सन्धात्रयेऽप्युदकं स्पृशन्तः स्नानादिकां क्रियां जलेन कुर्वन्तः प्राणिनो विशिष्टां गतिमाप्नुवन्तीति केचनोदाहरन्ति, एतच्चासम्यक् यतो यादकस्पर्शमात्रेण सिद्धिः स्यात् तत उदकसमाश्रिता मत्स्यबन्धादयः क्रूरकर्माणो निरनुक्रोशा बहवः प्राणिनः सिद्धयेयुरिति, यदपि तैरुच्यते-बाह्यमलापनयनसामर्थ्यमुदकस्य दृष्टमिति तदपि विचार्यमाणं न चटते, यतो यथोदकमनिष्टमलमपनयत्येव-मभिमतमध्यङ्गरागं कुङ्कमादिकमपनयति, ततश्च पुण्यस्यापनयनादिष्ट विघातकृद्विरुद्ध: स्यात्, किञ्च-यतीनां ब्रह्मचारिणामुदकस्नानं दषायैव, तथा चोक्तम् - "स्नानं मददर्पकरं, कामाङ्गं प्रथमं स्मृतम् । तस्मात्कामं परित्यज्य, न ते स्नान्ति दमे रताः ॥१॥" अपिच-नोदकक्लिन्नगात्रो हि, स्नात इत्यभिधीयते । स स्नातो यो व्रतस्नातः, स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥१॥" ॥१४॥ किञ्च - टीकार्थ - जो कई मूढ-अज्ञानी ठण्डे जल से नहाना आदि द्वारा मुक्ति होना बतलाते हैं वे कहते है कि अपराह्न में तीसरे पहर अथवा विकाल में-संध्या के समय प्रात:काल एवं ग्रहण के आदि-प्रारम्भ, अन्तअवसान के बीच के समय में तथा तीनों संध्याओं में ठंडे पानी से स्नानादि करने वाले प्राणी विशिष्ट गतिमुक्ति प्राप्त करते हैं उनका ऐसा कहना असम्यक्-मिथ्या है । यदि जल को छूने मात्र से मुक्ति प्राप्त हो तो जल के आश्रय में रहने वाले मत्स्य बंध-मत्स्यजीवि, क्रूर कर्मा-निष्करुण मल्लाह आदि मोक्ष को प्राप्त कर लेते वे जो यह कहते हैं कि बाहरी मल का अपनयन करने का जल में सामर्थ्य है, वह भी चिन्तन करने पर सही प्रतीत नहीं होता, क्योंकि जल जैसे अनिष्ट-अप्रिय बुरे मल का प्रक्षालन करता है उसी प्रकार वह मनोनुकूल अंगराग-चंदन आदि तथा कुंकुम आदि को-प्रक्षालित कर डालता है । अत: जल द्वारा पाप की तरह पुण्यों का भी अपनयन-प्रक्षालन होता है । जो इष्ट अभिप्सित का विधातक-विरोधी है, अतएव वह अहितकर है । ब्रह्मचारी साधु को वास्तव में पानी में स्नान करने से दोष लगता है, इसलिए कहा गया है-स्नान, मदअहंकार तथा दर्प-गर्व पैदा करता है, वह कामोद्दीपन का मुख्य हेतु है । अतएव जो पुरुष इन्द्रियों के दमन में अनिरत हैं, वे काम वासना से दूर रहते हुए स्नान नहीं करते । यह भी कहा है कि जो पुरुष पानी से क्लिन्नगात्रआईशरीर युक्त है, वह वास्तव में स्नात-स्नान किया हुआ नहीं कहा जा सकता, किन्तु जो पुरुष व्रतस्नातव्रतों के जल से नहाया हुआ है वह ही वास्तव में स्नात कहा जाता है, क्योंकि वह बाह्य और आभ्यन्तर दोनों ही प्रकार से शुद्ध है। (379)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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