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________________ श्री 'सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् अनुवाद प्रात:काल स्नानादि करने से मोक्ष प्राप्त नहीं होता । कड़वे नमक का भोजन में त्याग करने से भी मोक्ष नहीं होता । अन्य मतवादी मद्य, मांस एवं लहसुन का सेवन करते हैं, जो मोक्ष के मोक्ष धर्म के विपरीत है । ऐसा कर वे संसार में भटकते हैं । टीका प्रातः स्नानादिषु नास्ति मोक्ष 'इति प्रत्यूषजलावगाहनेन निःशीलानां मोक्षो न भवति, आदि ग्रहणात् हस्तपादादिप्रक्षालनं ग्रह्यते, तथाहि उदकपरिभोगेने तदाश्रितजीवानामुपमद्दः समुपजायते, न च जीवोपमर्दान्मोक्षावाप्तिरिति, न चै कान्तेनोदकं बाह्यमलस्याप्यपनयने समर्थम्, आथापि स्थात्तथा प्यान्तरं मलें न शोधयति, भावशुद्धया तच्छुद्धेः, अथ भावरहितस्यापि तच्छुद्धिः स्यात् ततो मत्स्यबन्धादीनामपि जलाभिषेकेण मुक्त्यवाप्तिः स्यात्, तथा 'क्षारस्य" पञ्चप्रकारस्यापि लवणस्य 'अनशनेन' अपरिभोगेन मोक्षो नास्ति, तथाहि लवणपरिभोग रहितानां मोक्षो भवतीत्ययुक्तिकमेतत् न चायमेकान्तो लवणमेव रसपुष्टिजनकमिति, क्षीरशर्करादिभिर्व्यभिचारात्, अपिचासौ प्रष्टव्यः - किं द्रव्यतो लवणवर्जनेन मोक्षावाप्तिः उत भावत: ?, यदिद्रव्यतस्ततो लवणरहित देशे सर्वेषां मोक्षः स्यात्, न चैवं दृष्टमिष्टं वा, अथ भावतस्ततो भाव एव प्रधानं किं लवणवर्जनेनेति, तथा 'ते' मूढा मद्यमांसं लशुनादिकं च भुक्त्वा 'अन्यत्र' मोक्षादन्यत्र संसारे वासम् - अवस्थानंतथाविद्यानुष्ठानसद्भावात् सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूपमोक्षमार्गस्यानुष्ठानाच्च 'परिकल्पयन्ति' समन्तान्निष्पादयन्तीति ॥ १३ ॥ साम्प्रतं विशेषेण परिजिहीर्षुरा टीकार्थ जो पुरुष निःशील - शीलवर्जित हैं, उन्हें प्रात:काल स्नान आदि करने से मोक्ष प्राप्त नहीं होता । आदि शब्द के प्रयोग से हस्तपादादि प्रक्षालन- हाथ पैर आदि धोने का भी यहाँ ग्रहण है । जल का उपयोग करने से जलगत जीवों का उपदर्मन- हनन होता है, उससे मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । जल एकांत रूप में - निश्चित रूप बाहरी मैल को भी दूर करने में सक्षम नहीं होता । वह कथंचित् ऐसा होता है, फिर वह आभ्यन्तर मल के अपनयन में दूर करने में समर्थ कैसे हो सकता है ? नहीं हो सकता, आन्तरिक शुद्धि भावों की शुद्धि से होती है। यदि भाव रहित प्राणी की भी जल द्वारा आन्तरिक शुद्धि हो तो मछलियों की हिंसा कर आजीविका चलाने वाले मल्लाह आदि की भी पानी में नहाने से मुक्ति होनी चाहिए। पांच प्रकार का नमक छोड़ने से भी मुक्ति नहीं मिल सकती । भोजन में नमक न लेने से मुक्ति मिल जाती है । यह कथन अयुक्तियुक्त है, नमक ही एकमात्र रसत्व का पोषक है, यह भी एकान्त रूप में सत्य नहीं है क्योंकि क्षीरदूध, शर्करा - चीनी आदि भी इस पुष्टि के जनक हैं, अपने आप में रसत्व के परिपोषक हैं । " - - - - उपर्युक्त मतवादी से यह प्रश्न किया जाना चाहिए कि द्रव्य से नमक का त्याग करने से मुक्ति प्राप्त होती है या भाव से । यदि द्रव्य से कहते हो तो जिस प्रदेश में नमक उत्पन्न नहीं होता, वहाँ निवास करने वाले सभी लोगों को सहज ही मुक्ति प्राप्त हो जानी चाहिए। ऐसा नहीं देखा जाता । न यह इष्ट- अभिप्सित या उपयुक्त ही है । यदि भाव से कहते हो तब तो फिर भाव की ही प्रधानता है। नमक का त्याग करने की क्या आवश्यकता है। वे अज्ञ जन मदिरा, मांस, लहसून, आदि का सेवन करते हुए संसार में निवास करते हैं, भटकते है, मोक्ष नहीं पाते, क्योंकि उनके अनुष्ठान कार्य कलाप संसार में वास करने के ही योग्य हैं । वे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप मोक्ष मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं। अतः वे मोक्ष से अन्यत्र संसार में ही वास करते हैं । अब सूत्रकार उक्त सिद्धान्तों का विशेष रूप से निराकरण - खण्डन करने के अभिप्राय से कहते हैं । ॐ ॐ ॐ 378
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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