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________________ वीरत्थुई अध्ययनं वह समग्र पर्वतों में श्रेष्ठ है, उसी तरह भगवान महावीर, वीर्य-आत्मपराक्रम तथा अनान्य गुणों में सर्वश्रेष्ठ हैं । स्वर्ग जिस पर देवता निवास करते हैं उनके लिए हर्षजनक है । प्रशस्त वर्ण, रस, गंध स्पर्श एवं प्रभाव आदि गुणों से विभूषित हैं उसी तरह भगवान भी अनेक गुणों से सुशोभित हैं अथवा जैसे स्वर्ग सुखप्रद है, अनेकानेक गुणों से शोभित है, उसी तरह वह सुमेरू पर्वत भी है । दृष्टान्त में कहे गये सुमेरु पर्वत का पुनः विवरण करते हुए कहते हैं। सयं सहस्साण उ जोयणाणं, तिकंडगे पंडगवेजयंते । से जोयणे णवणवते सहस्से, उद्धस्सितो हेट्ठ सहस्समेगं ॥१०॥ छाया - शतं सहस्त्राणान्तु योजनानां, त्रिकण्डकः पण्डकवैजयन्तः । स योजने नवनवतिसहस्त्राणि, ऊर्ध्वमुच्छ्रितोऽधः सहस्त्रमेकम् ॥ अनुवाद - सुमेरु पर्वत सत् सहस्त्र-सौ हजार योजन का ऊँचा है । उसके तीन विभाग हैं । उसके सर्वोच्च भाग पर स्थित पण्डक वन वैजयन्ती-पताका या ध्वजा के समान शोभित होता है, ऊँचा है । वह सुमेरु पर्वत निन्यानवें हजार योजन ऊँचा उठा हुआ है और एक हजार योजन भूमि में गड़ा है। टीका - स मेरुयोजनसहस्त्राणां शतमुच्चस्त्वेन, तथा त्रीणि कण्डान्यस्येति त्रिकण्डः, तद्यथा-भौम जाम्बूनदं वैडूर्यमिति, पुनरप्यसावेव विशेष्यते-'पण्डकवैजयन्त' इति पण्डकवनं शिरसि व्यवस्थितं वैजयन्तीकल्पंपताकाभूतं यस्य स तथा, तथाऽसावूर्ध्वमुच्छ्रि तो नवनवतिर्योजनसहस्त्राण्यधोऽपि सहस्त्रमेकमवगाढ इति ॥१०॥ तथा - टीकार्थ – वह सुमेरु पर्वत सौ हजार योजन ऊँचा है, उसके तीन विभाग है-(१) भूमिमय, (२) स्वर्णमय (३) वैडूर्यमय-मणिमय । पुनः सुमेरुपर्वत की विशेषता बतलाते हुये कहते हैं । उस सुमेरु पर्वत के मस्तक पर-सर्वोच्च शिखर पर विद्यमान पण्डक वन उसकी ध्वजा के समान शोभित होता है। सुमेरु निन्नानवें हजार योजन ऊँचा उठा हुआ है । और एक हजार योज़न भूमि में गड़ा हुआ है। पुढे णभे चिट्टइ भूमिवहिए, जं सूरिया अणुपरिवट्टयंति । से हेमवन्ने बहुनंदणे य, जंसी रतिं वेदयंती महिंदा ॥११॥ छाया - स्पृष्टो नभस्तिष्ठति भूमिवर्ती, यं सूर्य्या अनुवरिवर्तयन्ति । स हेमवर्णो बहुनन्दनश्च यस्मिन् रतिं वेदयन्ति महेन्द्राः ॥ अनुवाद - वह सुमेरु पर्वत आकाश का स्पर्श करता हुआ तथा भूमि में सम्प्रविष्ट हुआ विद्यमान है । आदित्य-नक्षत्र वृन्द उसका अनुवर्तन करते हैं, उसके पार्श्वभाग से भ्रमण करते हैं, घूमते हैं । उसका रंग स्वर्ण जैसा है । उसमें अनेक नंदन वन हैं । महेन्द्र-विशिष्ट ऋद्धि शाली महान इन्द्र गण उस पर रति-रमण क्रीड़ा करते हैं। टीका - 'नभसि' 'स्पष्टो' लग्नो नभो व्याप्य तिष्ठति तथा भूमिं चावगाह्य स्थित इति ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्लोक संस्पर्शी, तथा 'यं' मेरुं 'सूर्या' आदित्या ज्योतिष्का 'अनुपरिवर्त्तयन्ति' यस्य पार्श्वतो भ्रमन्तीत्यर्थः, तथाऽसौ (351
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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