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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः गोचर: ) भद्रे ! वृकपदंपश्ययद् वदन्त्यबहुश्रुताः ? " पिब खाद च साधुशोभने । यदतीतं वरगात्रि ! तन्नते। नहि भीरू ! गतं निवर्तते समुदयमात्रमिदं कलेवरम् । एवं ते तन्त्रान्तरीयाः स्वसमयार्थवासितान्त:करणाः सन्तो भगवदर्हदुक्तं ग्रन्थार्थमज्ञान परमार्थाः समतिक्रम्य स्वकीयेषु ग्रन्थेषु सिता:- संबद्धाः कामेषु च सक्ता इति ॥६॥ टीकार्थ प्रथम अध्ययन में स्वसमय - जैनसिद्धान्त के प्रतिपादन के पश्चात् परसमय-‍ -जैनेतरसिद्धान्तों के प्रतिपादन का भी समावेश है, अतः अपने सिद्धान्तों के कथन के बाद इतर सिद्धान्तों को बताते हुए आगमकार कहते हैं - कई पुरुष पहले जिन सिद्धान्तों की चर्चा की है उनका परित्याग कर अपनी रूचि के अनुसार निर्मित ग्रन्थों में आसक्त रहते है, यहाँ गाथा में जो 'एए- एके' शब्द का प्रयोग हुआ है, उसका तात्पर्य यह है कि सब ऐसे नहीं होते, कुछ होते हैं । अपने द्वारा रचित ग्रन्थों के सिद्धान्तों को स्वीकार करने का आशय यह है कि वे पूर्वोक्त ग्रन्थों-जैन ग्रन्थों का अतिक्रमण करते हैं । पूर्वोक्त ग्रन्थों में ऐसा अर्थ - अभिप्राय निरुपित हुआ है- जीवों का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है, ज्ञानावरणीयादि कर्मबंधन है, मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, परिग्रह आरम्भ आदि उसके-कर्मबंध के हेतु है । सम्यग्दर्शन आदि उपायों से वह बन्धन टूटता है । फलतः मोक्ष प्राप्त होता है, कतिय शाक्य - य - बौद्धानुयायी श्रमण तथा बृहस्पति आदि के सिद्धान्तों का अनुसरण करने वाले ब्राह्मण, तीर्थंकरों द्वारा कहे सभी उपर्युक्त सिद्धान्तों का अतिक्रमण - उल्लंघन कर परमार्थ- परमतत्व या सत्य को नहीं जानते हुए अनेक प्रकार से अपने-अपने सिद्धान्तों में आग्रहपूर्वक बद्ध-आसक्त रहते हैं । शाक्य ऐसा प्रतिपादन करते हैं सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और ज्ञान का आधारस्वरूप कोई आत्मा नाम का स्वतन्त्र तत्व नहीं है किन्तु एक विज्ञान का ही विवर्तन नाना रूपों में परिणयन होता है । सभी संस्कार - पदार्थ क्षणिक क्षणवर्ती है । सांख्यवादियों में विश्वास करने वाले अपने पदार्थों या तत्वों की व्याख्या का इस प्रकार निरूपण करते सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की साम्यावस्था - एक समान स्थिति को प्रकृति कहा जाता है, प्रकृति से महान् - बुद्धि तत्व उत्पन्न होता है । बुद्धि से अहंकार की निष्पत्ति होती है, अहंकार से सोलह तत्वों का समूह आविर्भूत होता है, उससे पांच महाभूत उत्पन्न होते हैं । पुरुषया आत्मा नामक तत्व का स्वरूप चैतन्य या चेतना है । वैशेषिक दर्शन में विश्वास रखने वाले बतलाते हैं। द्रव्य, गुण, कर्म सामान्य, विशेष एवं समवाय ये छः पदार्थ है । नैयायिक इस प्रकार प्रतिपादन करते है - के बोध से मोक्ष प्राप्त होता है । १. २. अन्वय' और व्यतिरेक' के ज्ञानपूर्वक प्रमाण प्रमेय आदि मीमांसक ऐसा कहते हैं- धर्म का रक्षणप्रेरणा है, प्रेरणा का तात्पर्य अज्ञात अर्थ को ज्ञापित करने वाला वैदिक वाक्य हैं । उस द्वारा धर्म अर्थ आदि का अवबोध होता है । सर्वज्ञनामक कोई पुरुष नहीं है । अर्था कोई भी सर्वज्ञ नहीं होता । मुक्ति का सद्भाव - अस्तित्व नहीं है । यत्सत्वे यत्सत्वमन्वयः जिसके होने पर जो हो, उसे अन्वम कहा जाता है । यधभावे यदभावः व्यतिरेकः जिसके न होने पर जो न हो, उसे व्यतिरेक कहा जाता 1 7
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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