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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् टीकार्थ - पहले जो कहा गया कि क्या जानता हुआ प्राणी बन्धन को तोड़ देता है, अब उसी का विश्लेषण करते हुए कहते हैं - वित्त का अर्थ द्रव्य है, वह सचित्त- सप्राण और अचित्त अप्राण दो प्रकार का होता है । भाई बहिन आदि तथा सम्पत्ति, वैभव आदि संसार में अत्यन्त कठोर कष्टप्रद शारीरिक मानसिक वेदनाएं अनुभव करते रहते हुए प्राणी को त्राण देने में उनसे उसको बचाने में समर्थ नहीं होते। इसे जानकर तथा प्राणियों का जीवन अल्पकालीन है, यह समझकर वह ज्ञपरिज्ञा- ज्ञानात्मक चेतना तथा प्रत्याख्यान परिज्ञा-त्यागमूलक चेतना द्वारा सचित्त तथा अचित्त परिग्रह, प्राणियों की हिंसा, पारिवारिकजनों के प्रति ममत्व-मोह ममत्व आदि जो कर्मबंध के स्थान या हेतु है इनका परित्यागकर वह कर्म से टूट जाता है- पृथक् हो जाता हैं, दूर हो जाता है । यहाँ 'तु' शब्द का प्रयोग निश्चयात्मकता के अर्थ में हैं, अर्थात् टूट ही जाता है । इसका यह भी अभिप्राय है वह कर्म से संयमपालन के अनुरूप क्रिया द्वारा कर्म के बंधन से छूट जाता है, पृथक् हो जाता 1 1 ॐ ॐ ॐ एए गंथे विउक्कम्म, एगे समणमाहणा । अयाणंता विउस्सित्ता, सत्ता कामेहि माणवा ॥६॥ छाया - एतान् ग्रंथान् व्युत्क्रम्य एके श्रमण ब्राह्मणाः । अजानन्तो व्युत्सिताः सक्ताः कामेषु मानवाः ॥६॥ अनुवाद - कई श्रमण- अजैनन-बुद्ध, अजितकेशकंबल, संजयवेलट्ठिपुत्र आदि श्रमण परम्परा के भिक्षु तथा ब्राह्मण-बृहस्पति आदि के मतानुयायी - ब्राह्मणपरम्परान्तर्वर्ती जन इन सिद्धान्तों का व्युत्क्रम कर उल्लंघन कर अपने सिद्धान्तों में अनुबद्ध रहते हैं । वे अज्ञानी कामभोगों में आसक्त बने रहते हैं । टीका अध्ययनार्थाधिकाराभिहितत्वात्स्वसमयप्रतिपादनान्तरं परसमय प्रतिपादनाभिधित्सयाऽऽह एतान् अनन्तरोक्तान् ग्रन्थान् व्युत्क्रम्यपरित्यज्यस्वरुचिविरचितार्थेषु ग्रन्थेषु सत्ता: 'सिता:' बद्धाः एके, न सर्वेइतिसम्बन्धः । ग्रन्थातिक्रमश्चैतेषां तदुक्तार्थानभ्युपगमात् । अनन्तरग्रन्थेषु चायमर्थोऽभिहित: तद्यथा - जीवास्तित्वेसतिं ज्ञानावरणीयादि कर्म बंधनम्। तस्यहेतवो मिथ्यात्वाविरति प्रमादादयः परिग्रहारंभादयश्च, तत् त्रोटनञ्चसम्यग्दर्शनाद्युपायेन मोक्षसद्भावश्चेत्येवमादिकः । तदेवमेके श्रमणा: शाक्यादयो बार्हस्पत्यमतानुसारिणश्च ब्राह्मणाः 'एतान्' अर्हदुक्तान् ग्रन्थानतिक्रम्यपरमार्थमजानानाः विविधम् अनेक प्रकारम् उत् प्रावल्येन सिताः बद्धाः स्वसमयेष्वभिनिविष्टाः। तथाचशाक्याएवं प्रतिपादयन्ति यथा - सुखदुःखेच्छाद्वेषज्ञानाधारभूतोनास्त्यात्मा कश्चित् किन्तु विज्ञानमेवैकं विवर्तत इति, क्षणिकाः सर्वसंस्काराः इत्यादि । तथा सांख्या एवं व्यवस्थिताः - " सत्त्वरजस्तमसांसाम्यावस्था प्रकृतिःप्रकृतेर्महान् महतोऽहंकारस्तस्माद्गणश्चषोड़शकः तस्मात् षोडशकादपि पञ्चभूतानि, चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमित्यादि ।” वैशेषिका : पुनराहु:-" द्रव्यगुण कर्मसामान्यविशेषसमवायाः षट् पदार्था" इति । तथा नैयायिकाः -प्रमाणप्रमेयादीनां पदार्थानामन्वयव्यतिरेकपरिज्ञानान्निः श्रेयसाधिगमइति व्यवस्थिताः । तथा मीमांसकाः चोदनालक्षणोधर्मो न च सर्वज्ञः कश्चिद्विद्यते मुक्त्यभावश्चेत्येवमाश्रिताः । चार्वाकास्त्वेवमभिहितवन्तो, यथानास्ति कश्चित् परलोकयायी भूतपञ्चकाद्व्यतिरिक्तो जीवाख्यः पदार्थो, नाऽपि पुण्यपापेस्तइत्यादि । एवं चाङ्गीकृत्यैते लोकायतिका ? ‘मानवाः' पुरुषाः ‘सक्ता' गृद्धा अध्युपपन्नाः कामेषु, इच्छामदनरूपेषु, तथाचोचुः "ऐतावानेव पुरुषोयावानिन्द्रिय -
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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