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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् उसकी प्रज्ञा लुप्त हो जाती है । वह अपगत विवेक-विवेक शून्य होकर अत्यधिक जलता रहता है । वह नरक सभी काल-वर्तमान, भूत और भविष्य में करूणप्रायः-करुणोत्पादक है, अथवा सम्पूर्णत: ऊष्ण स्थान है । पाप करने वाले प्राणियों को वह प्राप्त होता है, अर्थात् पापी जीव उसमें जाते हैं । उस स्थान की विशेषता बताते हुए सूत्रकार कहते हैं-वह अत्यन्त दुःखरूप है । कहने का तात्पर्य यह है कि नेत्रनिमेष मात्र भी समय वहाँ दु:ख से छूटने का नहीं मिलता । कहा है-नैत्र के पलक झपकने के समय में भी नारकीय जीव सुरव नहीं पाते, वे निरन्तर नरक में पकते हुए, पीडित होते हुए कष्ट भोगते रहते हैं। चत्तारि अगणीओ समारभित्ता, जहिंक्रूरकम्माऽभितविंति बालं । ते तत्थ चिटुंतऽभितप्पमाणा मच्छा व जीवंतु व जोतिपत्ता ॥१३॥ छाया - चतसृष्वग्नीन् समारभ्य, यस्मिन् क्रूरकर्माणोऽभितापयन्ति बालम् । ते तत्र तिष्ठन्त्यभितप्यमाना मत्स्या इव जीवन्त उपज्योतिः प्राप्ताः ॥ अनुवाद - नरक में परमाधामी देव चारों दिशाओं में चार प्रकार की अग्नियाँ जलाकर अज्ञजीवों को परितप्त करते हैं । जैसे जीवित मछली को आग में डाल दिया जाय तो वह वही परितप्त होती हुई, जलती हुई पड़ी रहती है, उसी तरह वे नारक आग में जलते हुए पड़े रहते हैं। टीका - चतसृष्वपि दिक्षु चतुरोऽग्रीन् समारभ्य 'प्रज्वाल्य' यत्र यस्मिन्नरकावासे 'क्रूरकर्माणो' नरक पाला आभिमुख्येनात्यर्थं तापयन्ति-भटित्रवत्पचन्ति 'बालम्' अझं नारकं पूर्वकृतदुश्चरितं ते तु नारकजीवा एवम् 'अभितप्यमानाः 'कदर्थ्यमानाः स्वकर्मगिडितास्तत्रैव प्रभूतं कालं महादुःखाकले नरके तिष्ठन्ति, दृष्टान्तमाहयथा जीवन्तो 'मत्स्या' मीना 'उपज्योतिः' अग्नेः समीपे प्राप्ताः परवशत्वादन्यत्र गन्तुमसमर्थास्तत्रैव तिष्ठन्ति, एवं नारका अपि, मत्स्यानां तापासहिष्णुत्वादग्नावत्यन्तं दुःखमुत्पद्यत इत्यतस्तद्ग्रहणमिति ॥१३।। किञ्चान्यत् ___टीकार्थ - नरक स्थान में क्रूर कर्मा-निर्दय नरकपाल चारों दिशाओं में चारों अग्नियाँ प्रज्वलित कर उन अज्ञानी नारक जीवों को जिन्होंने पूर्वजन्म में पाप किये, भट्टी की तरह अत्यन्त ताप देते हुए पकाते हैं, यों कदर्थित-उत्पीड़ित होते हुए वे नारक प्राणी अपने कर्मपाश में बंधे होने के कारण उस अत्यन्त दुःखप्रद नरक में दीर्घ काल तक पड़े रहते हैं । इस सम्बन्ध में एक दृष्टान्त देते हैं-जैसे एक जीवित मछली अग्नि के समीप पहुंचकर उसमें पड़कर परवश होने के कारण अन्यत्र नहीं जा सकती उसी जगह पड़ी रहती है, नारकीय प्राणी भी उसी की ज्यों नरक में पड़े रहते हैं, मछली परिताप नहीं सह सकती इसलिए उसे अग्नि में बहुत दुःख होता है, इसी कारण मछली का दृष्टान्त दिया गया है । संतच्छणं नाम महाहितावं, ते नारया जत्थ असाहुकम्मा । हत्थेहि पाएहि य बंधिऊणं, फलगं व तच्छंति कुहाडहत्था ॥१४॥ छाया - संतक्षणं नाम महाभितापं ते नारका यत्र असाधुकर्माणः । हस्तैश्च पादैश्व बध्धवा फलकमिव तक्ष्णुवन्ति कुठारहस्ताः ॥ (316)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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