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________________ सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् सर्वत्रोतोऽनुयायिना वैतरणीजलेन नष्टसंज्ञा अपि सुतरां ' स्मृतया विप्रहीणा' अपगतकर्तव्यविवेकाभवन्ति, अन्ये पुनर्नरकपालानारकैः क्रीडतस्तान्नष्टांस्त्रिशूलिकाभिः शूलाभिः 'दीर्घिकाभिः ' आयताभिर्विघ्वा अधोभूमौ कुर्व ॥९॥ अपिच - टीकार्थ वैतरणी नदी के अत्यन्त खारे, उष्ण और दुर्गन्ध युक्त पानी से तपे हुये दु:खित बेचारे नारकीय प्राणी उस नदी में चलायी जाती लोहे के तीखे कीलों से युक्त-कांटों से युक्त नौका पर आने लगते हैं, तो पहले से ही उन नौकाओं पर बैठे हुये नारक देव उन प्राणियों के गले में तीखे कीले चुभोते हैं । वे नरकगत प्राणी कल-कल शब्द के साथ बहती हुई वैतरणी के जल से संज्ञाहीन होते ही है, फिर तीखे काँटों से पीड़ा पाते हुये और अधिक स्मृति शून्य हो जाते हैं । उन्हें अपने कर्त्तव्य का जरा भी ज्ञान नहीं रहता । दूसरे नरक पाल-नारक देव नरकगत जीवों के साथ क्रीड़ा करते हुए उन संज्ञारहित अभागे जीवों को लम्बे लम्बे शूलों- त्रिशूलों में पिरोकर जमीन पर पछाड़ देते हैं । केसिं च बंधितु गले सिलाओ, उदगंसि बोलंति मनलयंसि । कलुंबुयावालुय मुम्मुरे य लोलंति पच्चंति अ तत्थ अन्ने ॥१०॥ केषां च बद्ध्वा गले शिलाः, उदके मज्जयन्ति महालये । कलम्बुकाबालुकायां मुर्मुरे च लोलयन्ति पचति च तत्राऽन्ये ॥ छाया अनुवाद नरक पर कई नरकपाल किन्हीं नरकगत प्राणियों के गले में पत्थर की शिला बाँधकर उन्हें अगाध जल में डूबो देते हैं । तथा कई अन्य नरकपाल अत्यन्त परितप्त गर्म बालू में तथा तुषाग्नि में उन नरक के प्राणियों को इधर उधर घसीटते हैं, रगड़ते हैं, या पकाते हैं । टीका – केषांचिन्नारकाणां परमाधार्मिका महतीं शिलां गले बद्ध्वा महत्युदके 'बोलंति' त्ति, निमज्जयन्ति, पुस्ततः समाकृष्य वैतरणीनद्याः कलम्बुकावालुकायां मुर्मुराग्नै च 'लोलयन्ति' अतितप्तवालुकायां चणकानिव समन्ततो घोलयन्ति, तथा अन्ये 'तत्र' नरकावासे स्वकर्मपाशावपाशितान्नकारन् सुण्ठके प्रोतकमांसपेशीवत् 'पचन्ति' भर्जयन्तीति ॥ १० ॥ तथा - : टीकार्थ नारक देव किन्हीं नरकगत जीवों के गले में बड़ी-बड़ी पाषाण शिलायें बाँध देते हैं और उन्हें अगाध जल में निमज्जित कर देते हैं, डुबो देते हैं, फिर वे उनको वहाँ से खींच लेते हैं, और परितप्तउष्णता से लाल बनी बालू में, तुषाग्नि में डालकर घिसते हैं, रगड़ते हैं। बहुत तपी हुई बालू में चनों की भूंजने की ज्यों इधर उधर घुमाते हैं । अन्य परमाधार्मिक देव अपने कर्मों के जाल में ग्रस्त उन नरकगत जीवों को शूल में पिरोकर पकाये जाने वाले मांस की तरह पकाते हैं । ॐ अंधंतमं आसूरियं नाम महाभितावं, दुप्पतरं महंतं । उड्ढं अहेअं तिरियं दिसासु, समाहिओ जत्थऽगणी झियाई ॥११॥ छाया असूर्य्यं नाम महाभितापमन्धन्तमं दुष्प्रतरं महान्तम् । ऊर्ध्व मस्तिर्य्यग्दिशासु समाहितो यत्राग्निः प्रज्वलति ॥ 314 -
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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