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________________ स्त्री परिज्ञाध्ययनं . द्वितीयः उद्देशकः R उक्तः प्रथमोद्दशकः, साम्प्रतं द्वितीयः समारभ्यते, अस्य चायममिसम्बन्धः-इहानन्तरोद्देशके स्त्री संस्तवाच्चारित्रस्खलनमुक्तं, स्खलितशीलस्य या अवस्था इहैव प्रादुर्भवति तत्कृतकर्मबन्धश्वतदिह प्रतिपाद्यते, इत्यनेन सम्बन्धे नायातस्यास्योद्देशकस्यादि सूत्रम् - पहले उद्देशक का वर्णन किया जा चुका है । अब दूसरा उद्देशक प्रारम्भ किया जा रहा है । इसका सम्बन्ध इस प्रकार है-पूर्व उद्देशक में स्त्री के संस्तव-परिचय एवं सम्पर्क से चरित्र स्खलन का विवेचन किया गया । जो शील से स्खलित-भ्रष्ट या पतित हो जाता है, ऐसे पुरुष की इस लोक में जो अवस्था होती है, जो कर्मबंध होता है, इस उद्देशक में उसका वर्णन किया जा रहा है । इस सम्बन्ध से आगत इस उद्देशक का यह आदि सूत्र है - ओए सया ण रजेजा, भोग कामी पुणो विरजेज्जा । भोगे समणाणं सुणेह; जह भुंजंति भिक्खुणो एगे ॥१॥ छाया - ओजः सदा न रज्येत, भोगकामी पुनर्विरज्येत । भोगे श्रमणानां शृणुत, यथा भुजन्ति भिक्षव एके ॥ अनुवाद - ओजस्वी-आत्म पराक्रम के धनी साधु को भोग वासना में अपना चित्त कभी नहीं लगाना चाहिए, यदि देवयोगवश वैसा हो जाय तो उसे ज्ञान के सहारे अपने आपको दूर कर लेना चाहिए । भोगोपभोग करना साधु के लिए अनुचित है, फिर भी कुछ साधु ऐसे होते हैं, जो भोग भोगते हैं, यह सुने । . ___टीका - अस्य चानन्तरपरस्परसूत्रसम्बन्धो वक्तव्यः, स चायं सम्बन्धो-विषयपाशेर्मोहमागच्छति यतोऽत 'ओज एको रागद्वेषवियुतः स्त्रीषु रागं न कुर्यात्, परम्परसूत्रसम्बन्धस्तु संलोकनीयमनगारं दृष्ट्वा च यदि काचिद्योषित् साधुमशनादिना नीवारकल्पेन प्रतारयेत् तत्रौजः सन्न रज्येतेति तत्रौजो द्रव्यतः परमाणुः भावतस्तु रागद्वेषवियुतः, स्त्रीषुरागादिहैव वक्ष्यमाणनीत्या नानाविधा विडम्बना भवन्ति तत्कृतश्च कर्मबन्धः तद्विपाकाच्चामुत्र नरकादौ तीव्रा वेदना भवन्ति यतो ऽत एतन्मत्वा भावोजःसन् 'सदा' सर्वकाले तास्वनर्थखनिषु स्त्रीषु न रज्येत, तथा तद्यपि मोहोदयात् भोगाभिलाषी भवेत तथाप्यैहिकामष्मिकापायान परिगणय्य पनस्ताभ्यो विरज्येत, एतदक्तं भवति-कर्मोदयात्प्रवत्तमपि चितं हेयोपोदयपर्यालोचयना ज्ञानाङ्कशेन निवर्तयेदिति, तथा श्राम्यन्ति-तपसा खिद्यन्तीति श्रमणास्तेषामपि भोगा इत्येतच्छृणुत यूयं, एतदुक्तं भवति-गृहस्थानामपि भोग विडम्बनाप्राया यतीनां तु भोगा इत्येतदेव विडम्बनाप्रायं, किं पुनस्तत्कृतावस्थाः तथा चोक्तम्-'मुण्डं शिर' इत्यादि पूर्ववत्, तथा यथा च भोगान् ‘एके' अपुष्टधर्माणो "भिक्षवो' यतयो विडम्बनाप्रायान् भुज्जते तथोद्देशकसूत्रेणैव वक्ष्यमाणेनोत्तरत्र महत्ता प्रबन्धेन दर्शयिष्यति अन्यैरप्युक्तम् "कृशः काणः खजः श्रवणरहितः पुच्छविकलः, क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककपालार्दितगलः । व्रणैः पूयक्किन्नैः कृमिकुलशतैराविलतनुः, शुनीमन्वेति श्वा हतमपि च हन्त्येव मदनः ॥१॥" इत्यादि, ॥१॥ भोगिनो विडम्बनां दर्शयितुमाह - टीकार्थ - यह सूत्र आगे पीछे के सूत्रों से सम्बद्ध है, वह संबंध इस प्रकार है-सांसारिक काम भोग रूपी पाश से मनुष्य मोहमूढ़ बनता है, अतएव रागद्वेष विवर्जित साधु स्त्रियों में राग न करे, आसक्त न बने, -289
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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