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________________ स्त्री परिज्ञाध्ययनं भोजन क्यों किया जो परिणाम में कष्ट देने वाला है, उसी प्रकार नारी के बंधन में बंधा हुआ पुरुष भी बेटा, पोता, बेटी, जामाता, बहिन, भतीजा, भांजा आदि के हेतु खान पान शादी विवाह गहने जात कर्म-जन्मोत्सव, मृतकर्म-मरणोपलक्ष्य में किये जाने वाले जातीयकृत्य तथा पारिवारिक जनों की बीमारी में इलाज आदि की चिन्ता से व्यथित होकर वह अपने देह के लिए जो करणीय है, वह भी भूल जाता है अपने शरीर की भी चिन्ता नहीं कर पाता । वह ऐहिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के सत्कार्य से रहित होकर अपने परिवार के पालन पोषण के कार्य में ही सदैव आकुल और चिन्तित रहता हुआ पश्चाताप करता है । ऊपर वर्णित फल विपाक पर विचार कर, पाठान्तर में विवेगं विवेक पद के अनुसार विवेक को गृहीत कर चारित्र में विघ्न करने वाली नारियों के साथ एक स्थान में आवास करना विवेकशील पुरुषों के सदुष्ठान - उत्तम सच्चारित्र मूलक उपकर्मो का विघातक - विनाशक होता है । स्त्री के सम्बन्ध में सम्भावित दोषों का दिग्दर्शन कराकर सूत्रधार अब उनका उपसंहार करते हुए कहते हैं । तम्हा उ वज्जए इत्थी, विसलित्तं व कंटगं नच्चा । ओए कुलाणि वसवत्ती, आघाते ण सेवि णिग्गंथे ॥११॥ छाया - तस्मात्तु वर्जयेत् स्त्रीः, विषलिप्तमिव कण्टकं ज्ञात्वा । एकः कुलानि वशवर्ती आख्याति न सोऽपि निग्रन्थः ॥ * * * अनुवाद - साधु स्त्रियों को जहर से सने हुए कांटे के समान जानकर दूर से ही उनका परित्याग कर दे। जो स्त्रियों का वशवर्ती होकर उनके चंगुल में फंसकर गृहस्थों के घर अकेला जाकर धर्मोपदेश करता है, वह वास्तव में निर्ग्रस्थ-साधु नहीं है । - टीका यस्मात् विपाककटुः स्त्रीभिः सह सम्पर्कस्तस्मात्कारणात् स्त्रियो वर्जयेत् तु शब्दात्तदालापमपि न कुर्यात्, किंवदित्याह-विषोपलिप्तं कण्टकमिव 'ज्ञात्वा' अवगम्य स्त्रियं वजयेदिति अपिच - विषदिग्धकण्टकः शरीरावयवे भग्नः सन्ननर्थमा पादयेत् स्त्रियक्तु स्मरणादपि तदुक्तम् - " विषस्य विषयाणां च दूरमत्यन्तमन्तरम् । उपभुक्तं विषं हन्ति, विषयाः स्मरणादपि ॥ १ ॥ " तथा 'वरि विस खइयं न विसयसुहु इक्कसि विसिण मरंति । विसयामिस पुण घारिया नर नर एहि पडंति ॥ १ ॥” छाया - वरंविषं जग्धं न विषयसुखं एकशो विषेण म्रियते । विषयामिषघातिताः पुनर्नरा नरकेषुपतन्ति ॥१॥ तथा 'ओजः' एक: असहाय: सन् 'कुलानि ' गृहस्थानां गृहाणि गत्वा स्त्रीणां वशवर्ती तन्निर्दिष्टवेलागमनेन तदानुकूल्यं भजमानो धर्ममाख्याति योऽसावपि 'न निर्ग्रन्थो' न सम्यक् प्रव्रजितो, निषिद्धाचरणसेवनादवश्यं तत्रापायसम्भवादिति, यदा पुनः काचित्कुतश्चिन्निमित्तादागन्तुमसमर्था वृद्धा वा भवेत्तदाऽपरसहायसाध्वभावे एकाक्यपि गत्वा अपरस्त्रीवृन्दमध्यगतायाः पुरुषसमन्वितायां वा स्त्रीनिन्दाविषयजुगुप्साप्रधानं वैराग्यजननं विधिना धर्मं कथयेदपीति ||११|| अन्वयतिरेकाभ्यामुक्तोऽर्थः सुगमो भवतीत्यभिप्रायवानाह 271 -
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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