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________________ स्त्री परिज्ञाध्ययनं टीका - 'सीह जहे 'त्यादि, यथेति दृष्टन्तोपदर्शनार्थे यथा बन्धनविधिज्ञाः सिंहं पिशितादिनाऽऽमिषेणोप प्रलोभ्य 'निर्भय' गतभीकं निर्भयत्वादेव एकचरं 'पाशेन' गलयन्त्रादिना वन्धन्ति बद्ध्वा च बहुप्रकारं कदर्थयन्ति, एवं स्त्रियोनानाविधैरूपायैः पेशलभाषणादिभिः ‘एगतियन्ति' कञ्चन तथाविधम् 'अनगारं' साधु 'संवृतमपि' मनोवाक्कायगुप्तमपि 'बध्नन्ति' स्ववशं कुर्वन्तीति, संवृतग्रहञ्च स्त्रीणां सामोपदर्शनार्थं, तथाहि-संवृतोऽपि ताभिर्बध्यते, किं पुनरपिरोऽसंवृत इति ॥८॥ किञ्च - टीकार्थ - इस गाथा में जहां यथा शब्द दृष्टांत को सूचित करने के लिए आया है, जैसे शेर को पकड़ने का उपाय जानने वाले पुरुष निर्भय होकर अकेले घूमने वाले सिंह को आमिष-मांस आदि का प्रलोभन देकर गले के फन्दे आदि द्वारा बद्ध कर लेते हैं । बांधकर उसे बहुत तरह से कदर्थित पीड़ित करते हैं । इसी प्रकार स्त्रियाँ तरह-तरह के उपायों एवं मीठी बोली, आदि से साधु को, जो मन वचन एवं शरीर द्वारा अपने आपको गुप्त रखता है-पापों से बचाए रखता है, अपने काबू में कर लेती हैं । यहाँ संवुड-संवृत पद स्त्रियों का सामर्थ्य, सशक्तता बताने हेतु प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् संवृत-संवरयुक्त साधु भी उनके द्वारा आकृष्ट हो जाता है किसी दूसरे की तो बात ही क्या जो असंवृत-संवर रहित हो । अह तत्थ पुणो णमयंती, रहकारो व णेमि आणुपुव्वीए । बद्धे मिए व पासेणं, फंदंते वि ण मुच्चए ताहे ॥१॥ छाया - अथ तत्र पुनर्नमयन्ति, रथकार इव नेमिमानुपूर्व्या । बद्धो मृग इव पाशेन स्पन्दमानोऽपि न मुच्यते तस्मात् ॥ अनुवाद - रथकार जैसे रथ की नेमि को क्रमशः नम्र बनाता है, नवाता है, झुकाता है, उसी प्रकार स्त्रियाँ साधु को अपने वशगत बनाकर अपनी ओर नत करती हैं, झुकाती जाती हैं, जैसे जाल में बंधा हुआ हिरण दुःख से छटपटाता है पर वह जाल से छूट नहीं सकता, उसी तरह स्त्री के जाल में फंसा हुआ साधु प्रयत्न करने पर भी उससे छुटकारा नहीं पा सकता । । टीका - 'अथ' इति स्ववशीकरणानन्तरं पुनस्तत्र-स्वाभिप्रेते वस्तुनि 'नमयन्ति' प्रहूं कुर्वन्ति, यथा'रथकारो' वर्धकिः 'नेमिकाष्ठं' चक्रबाह्यभ्रमिरूपमानुपूर्व्या नमयति, एवं ता अपि साधु स्वकार्यानुकूल्ये प्रवर्तयन्ति, स च साधुर्मंगवत्, पाशेन बद्धो मोक्षार्थं स्पन्दमानोऽपि ततः पाशान्नमुच्यत इति ॥९॥ किञ्च - टीकार्थ - स्त्रियां साधु को अपने अधीन बनाने के बाद अपने अभिप्रेत-अपने इच्छित कार्य की दिशा में झुका लेती है । रथकार जैसे पहिये के बाहर के गोलाकार नेमि को क्रमशः झुकाता है, नवाता है, उसी प्रकार स्त्रियाँ भी साधु को क्रमशः अपने अनुकूल बनाती हैं, अपने अनुकूल प्रिय कार्यों में प्रवृत्त करती हैं। स्त्री के जाल में बंधा हुआ वह साधु फंदे में फंसे हुए हिरण की तरह उससे मुक्त होने का प्रयत्न करने पर भी मुक्त नहीं हो पाता । अह सेऽणुतप्पई पच्छा, भोच्चा पायसं व विसमिस्सं । एवं विवेगमादाय, संवासो नवि कप्पए दविए ॥१०॥ -(269
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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