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________________ स्त्री परिज्ञाध्ययनं छाया - आमन्त्र्य संस्थाप्य भिक्षुमात्मना निमन्त्रयन्ति । ___एताँश्चैव स जानीयात्, शब्दान् विरूपरूपान् ॥ अनुवाद - कामुक स्त्रियाँ साधु को संकेत करती हैं कि हम अमुक स्थान पर आपके पास आयेंगी। वे तरह-तरह की बातों से अपने प्रति साधु में विश्वास पैदा करती हैं । फिर वे साधु को भोग हेतु आमन्त्रित करती हैं । विवेकशील साधु स्त्रियों के वैसे शब्दों को विविध प्रकार के बन्धनों के तुल्य समझे । टीका - 'आमंतिय' इत्यादि, स्त्रियो हि स्वभावेनैवाकर्तव्य प्रवणाः साधुमामन्त्र्य यथाऽहममुकस्यां वेलायां भवदन्तिमागमिष्यामीत्येवं सङ्केतं ग्राहयित्वा तथा 'उस्सविय' त्ति संस्थाप्योच्चावचैर्विश्रम्भजनकैरालापैर्विश्रम्भे पातयित्वा पुनरकार्यकरणायात्मना निमन्त्रयन्ति, आत्मानोपभोगेन साधुमभ्युपगमं कारयन्ति । यदिवा-साधोर्भयापहरणार्थं ता एव योषितः प्रोचुः, तद्यथा-भर्तारमामन्त्र्यापृच्छयाहमिहाऽऽयाता, तथा संस्थाप्य-भोजनपादधावनशयनदिकया क्रिययोपचर्य ततस्तवान्तिकमागतेत्यतो भवता सर्वा मद्भर्तुजनितामाशङ्का परित्यज्य निर्भयेन भाव्यमित्येवमादिकवैचोभिविश्रम्भमुत्पाद्य भिक्षुमात्मना निमन्त्रयन्ते, युष्मदीयमिदं शरीरकं यादृक्षस्य क्षोदियसोगरीयसो वा कार्यस्य क्षम तत्रैव नियोज्यतामित्येवमुपप्रलोभयन्ति, स च भिक्षुरवगतपरमार्थः एतानेव 'विरुपरूपान्' नानाप्रकारान् ‘शब्दादीन्' विषयान् तत्स्वरूपनिरूपणतो ज्ञपरिज्ञया जानीयात् यथैते स्त्रीसंसर्गापादिताः शब्दोदयो विषया दुर्गतिगमनैकहेतवः सन्मार्गार्गलारूपा इत्येवमवबुध्येत, तथा प्रत्याख्यानपरिज्ञया च तद्विपाकावगमेन परिहरेदिति ॥६॥ अन्यच्च टीकार्थ - स्त्रियाँ पाश या फन्दे की ज्यों कैसे फंसा लेती है, सूत्रकार यह प्रतिपादित करते हैं-स्त्रियों का ऐसा स्वभाव है कि ये अकर्तव्य-न करने योग्य कार्य में प्रवण-तत्पर रहती हैं । वे साधु को आमन्त्रित करती हैं अमुक समय मैं आपके पास आऊँगी, इस प्रकार संकेत देकर वह ऊँचे नीचे वचनों द्वारा साधु को अपने विश्वास में लेती हैं फिर अपने साथ अकार्य करने हेतु उसे आमन्त्रित करती हैं, उसे अपने साथ उपभोग करने हेतु तैयार करती हैं । अथवा साधु के भय का अपहरण करने हेतु-उसका भय दूर करने के लिए वे कहती हैं कि मैं अपने पति को पूछकर यहां आयी हूँ। अपने पति को खाना खिलाकर, उनके पैर धोकर, उन्हें बिछौने पर सुलाकर आपके पास आयी हूँ अत: आप मेरे पति की आशंका न कर निडर रहे । इस प्रकार के वचनों द्वारा वह साधु के मन में विश्वास पैदा कर अपने साथ सम्भोग करने हेतु आमन्त्रित करती हैं । वे कहती हैं मेरा यह शरीर आपका ही है । जिस किसी छोटे-बड़े काम के यह लायक हो, उसे काम में ले। यह कहकर स्त्रियाँ साधु को लुभाती हैं । किन्तु परमार्थवेत्ता साधु यह प्रज्ञा-ज्ञान द्वारा स्त्री सम्बन्धी इन भिन्न प्रकार के शब्दों को समझे कि ये दुर्गति में जाने के हेतु हैं उत्तम मार्ग में आगे बढ़ते हुए पुरुष के लिए आगल की ज्यों रुकावट है । इनका फल बुरा होता है । यह समझकर वह प्रत्याख्यान परिज्ञा-त्यागोन्मुख विवेक द्वारा इन्हें छोड़ दे। मणबंधेणेहिं णेगेहिं, कलुण विणीयमुवगसित्ताणं । अदु मंजुलाइ भासंति, आणवयंति भिन्नकहाहिं ॥७॥ छाया - मनोबन्धनैरनेकैः करुणविनीतमुपश्लिष्य । अथ मजुलानि भाषन्ते, आज्ञापयन्ति भिन्नकथाभिः ॥ (267)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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