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________________ स्त्री परिज्ञाध्ययनं छाया - शयनासनेन योग्येन स्त्रिय एकदा निमन्त्रयन्ति । एतानि चैव स जानीयात् पाशान् विरूपरूपान् ॥ अनुवाद - कभी स्त्रियाँ एकान्त स्थान में उत्तम शयन-उत्तम पलंग तथा उत्तम आसन पर बैठने हेतु आमन्त्रित करती हैं । तत्वदर्शी साधु इन उपक्रमों को नाना प्रकार के पार्श्व-बन्धन या जाल समझे। टीका - 'सयणासणे' इत्यादि, शय्यतेऽस्मिन्निति शयनं-पर्यङ्कादि तथाऽऽस्यतेऽस्मिन्नित्यासनम्आसंदकादीत्येवमादिना 'योग्येन' उपभोगाहेण कालोचित्तेन 'स्त्रियो' योषित 'एकदा' इति विविक्तदेशकालादौ 'निमन्त्रयन्ति' अभ्युपगमं ग्राहयन्ति, इदमुक्तं भवति-शयनासनद्युपभोगं प्रति साधुं प्रार्थयन्ति, 'एतानेव' शयनासननिमन्त्रणरूपान् स साधुर्विदितवेद्यः परमार्थदर्शी 'जानीयाद्' अवबुध्येत स्त्रीसम्बन्धकारिणः पाशयन्ति बध्नन्तीति पाशास्तान् ‘विरूपरूपान्' नानाप्रकारानिति । इदमुक्तं भवति-स्त्रियो ह्यासन्नगामिन्यो भवन्ति, तथा चोक्तम् - _ 'अंबं' वा र्निबं वा अब्भासगुणेण आरूहइ वल्ली । एवं इत्थीतोवि य जं आसन्नतमिच्छन्ति ॥१॥ छाया - आम्र वा निम्ब बाभ्यासगुणेनारोहति वल्ली । एवं स्त्रियोऽपि य एवासन्नस्तभिच्छंति ॥१॥ तदेवम्भूताः स्त्रियो ज्ञात्वा न ताभिः सार्धं साधुः सङ्गं कुर्यात्, यतस्तदुपचारादिकः सङ्गो दुष्परिहार्यो भवति, तदुक्तम् - "जं इच्छसि घेत्तुं जे पुव्विं तं आमिसेण गिण्हाहि । आमिसपास निबद्धो काहिइ कजं अकज्जे वा ॥१॥ ।४। किञ्च - छाया - यान् ग्रहीतुमिच्छसि तानाभिषेण पूर्वगृहाण । यदाभिषपाशनिबद्धः करिष्यति कार्यमकार्य वा ॥१॥ टीकार्थ – जिसके ऊपर शयन किया जाता है-सोया जाता है उसे शयन कहा जाता है । जिस पर बैठते है उसे आसन कहते हैं । आसन्दक-कुर्सी आदि आसन में आते हैं । स्त्रियाँ एकान्त स्थान तथा अनुकूल समय देखकर इन उपभोग्य वस्तुओं को ग्रहण करने हेतु साधु से अनुरोध करती हैं । इसका अभिप्राय यह है कि स्त्रियाँ इनका उपभोग करने हेतु साधु से अभ्यर्थना करती हैं किन्तु विदितवेद्य, जानने योग्य तथ्यों का ज्ञाता, परमार्थ दृष्टा साधु यह समझे कि यह आसन शयन आदि के ग्रहण हेतु किये गये आमन्त्रण स्त्रियों के साथ फँसाने वाले नाना प्रकार के बन्धन या जाल हैं । आशय यह है कि स्त्रियाँ आसंगवृत्ति-पास में स्थित पुरुष की कामना करती हैं। चाहे आम का पेड़ हो या नीम का, बेल (लता) स्वभाव से ही जो भी पास होगा उस पर चढ़ती है । इसी प्रकार स्त्री जो भी पुरुष पास में हो उसकी अभिलाषा करती है । साधु यह समझ कर उसका संग न करे, सहचर्य में न रहे । स्त्रियों के द्वारा प्रदर्शित सेवा परिचर्या के कारण उनके साथ जो आसक्ति बन जाती है, उसे छोड़ पाना बहुत कठिन है । कहा गया है यदि तुम स्त्रियों के रूप में कुछ ग्रहण करना चाहते हो-लेना चाहते हो उसे मछलियों को पकड़ने हेतु फैलाये गये जाल के काटे में लटकती माँस की बोटी के समान समझो उसके लोभ के जाल में फंसकर प्राणी कार्य अकार्य सब कुछ करने में तत्पर हो जाता है । नो तासु चक्खु संधेजा, नोवि य साहसं समभिजाणे । णो सहियंपि विहरेज्जा, एवमप्पा सुरक्खिओ होइ ॥५॥ 265
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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