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________________ - स्त्री परिज्ञाध्ययनं है, जिसका यह अभिप्राय है कि साधु विविक्त-एकांत या स्त्री, पशु, नपुंसक रहित स्थान का शील पालन हेतु अन्वेषण करता है । ऐसे कृत प्रतिज्ञ-प्रतिज्ञाशील या संयमोन्मुख साधु के प्रति अविवेकिनी स्त्रियों द्वारा क्या किया जाता है, यह कहते हैं । सहुमेणं तं परिक्कम, छन्नपएण इथिओ मंदा । उव्वायंपि ताउ जाणंसु जहा लिस्संति भिक्खुणो एगे ॥२॥ छाया - सूक्ष्मेण तं परिक्रम्य छन्नपदेन स्त्रियो मन्दाः । उपायमपि ताः जानन्ति यथा श्लिष्यन्ति भिक्षव एके ॥ अनुवाद - मंद-विवेकशून्य स्त्रियाँ किसी बहाने से साधु के समीप आकर कपटपूर्ण या रहस्य पूर्ण शब्द द्वारा उसे संयम से भ्रष्ट करने का प्रयास करती हैं । वे यह भी जानती है कि किस प्रकार कोई साधु उनसे क्लिष्ट-उनमें आसक्त हो सकता है । ___टीका - 'सुहुमेणं' इत्यादि, 'तं' महापुरुषं साधु 'सूक्ष्मेण' अपरकार्यव्यपदेशभूतेन "छलपदेने "त्ति छद्मना-कपटजालेन 'पराक्रम्य' तत्समीपमागत्य, यदिवा-पसक्रम्ये 'ति शीलस्खलनयोग्यतापत्त्या अभिभूय, काः?-'स्त्रियः' कूलवालुकादीनामिव माग्धगणिकाद्या नानाविधकपटशतकरणदक्षा विविधविब्बोकवत्यो भाक्षमन्दाः-कामेन्द्रेकविधायितया सदसद्विवेकविकला: समीपमागत्य शीलाद् ध्वंसयन्ति, एतदुक्तं भवति-भ्रातृपुत्रव्यपदेशेन साधु समीपमागत्य संयमाद् भ्रंशयन्ति, तथा चोक्तम् - "पियपुत्त भाइकिडगा णत्तूकिडगा य सयणकिडगा य । एते जोव्वणकिडगा पच्छन्नपई महिलियाणं ॥१॥" छाया - प्रियपुत्रभातृक्रीडका नप्तृक्रीडकाच स्वजनक्रीडकाश्च एते यौवनक्रीडकाः प्राप्ताः प्रच्छन्नपतयो महिलानां ॥१॥ यदिवा-छन्नपदेनेति-गुप्ताभिधानेन, तद्यथा - "काले प्रसुप्तस्य जनार्दनक्ष्य, मेघान्धकारासु च शर्वरीषु । मिथ्या न भाषामि विशालनेत्रे ! ते प्रत्यया वे प्रथमाक्षरेषु ॥१॥" इत्यादि, ताः स्त्रियो मायाप्रधानाः प्रतारणोपायमपि जानन्ति-उत्पन्नप्रतिभतया विदन्ति, पाठान्तरं वा ज्ञातवत्यः, यथा 'श्लिष्यन्ते' विवेकिनोऽपि साधव एके तथाविधकर्मोदयात् तासु सङ्गमुपयान्ति ॥२॥ तानेव सूक्ष्म प्रतारणोपायान् दर्शयितुमाह - टीकार्थ - महापुरुष-महनीय साधु का स्त्रियाँ किसी बहाने से-कपट से उसके पास आकर, शील से भ्रष्ट कर देती हैं । अथवा उस महापुरुष को ब्रह्मचर्य से स्खलित होने योग्य बनाकर पतित कर देती हैं। जैसे कपट-छलपूर्ण कार्य करने में कुशल अनेक प्रकार से कामोद्वेग-काम वासना उत्पन्न करने वाली सत असत के विवेक से रहित मन्द-अज्ञानवती मागध गणिका-मगध देशीय वेश्या आदि नारियों ने कुल बालुक आदि तापसो को शील से-ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट कर डाला था उसी तरह स्त्रियाँ साधु को शील से पतित कर डालती हैं । अभिप्राय यह है कि भाई-पुत्र आदि के विष से औरते साधु के निकट आकर उसे संयम से गिरा देती हैं । कहा है-प्रिय पुत्र भाई, नाती आदि कौटुम्बिक सांसारिक सम्बन्धों का बहाना बनाकर गुप्त रूप से पति को बनाना स्त्रियों की रीति है, वे गुप्त नाम द्वारा षडयन्त्र रचती है निम्नांकित श्लोक इसका उदाहरण है - 263)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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