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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् टीका - ' एवं ' परस्परोकारादिना यूयं गृहस्था इव सरागस्था:- सह रागेण वर्तत इति सरागः-स्वभावस्तस्मिन् तिष्ठन्तीति ते तथा, 'अन्योन्यं' परस्परतो वशमुपागताः - परस्परायत्ताः, यतयो हि निःसङ्गतया न कस्यचिदा यत्ता भवन्ति, यतो गृहस्थानामयं न्याय इति, तथा नष्टः- अपगतं सत्यथः - सद्भाव :- सन्मार्ग परमार्तो येभ्यस्ते तथा । एवम्भूताश्च यूयं 'संसारस्य' चतुर्गतिभ्रमणलक्षणस्य 'अपारगा' अतीरगामिन इति ॥१०॥ अयं तावत्पूर्व पूक्षः अस्य च दूषणायाह टीकार्थ - एक दूसरे के उपकारी या सहयोगी आप गृहस्थों की ज्यों सरागस्थ - रागात्मक प्रवृत्ति या व्यवहार में वर्तनशील हैं। जो राग युक्त होता हैं उसे सराग कहा जाता है। वैसे स्वभाव में जो स्थित होता है, वह सरागस्थ है । आप परस्पर एक दूसरे के वशगत रहते हैं, जो समुचित नहीं है क्योंकि संयति वृन्द मुनिगण निःसंग-संग वर्जित या आसक्ति रहित होते है । वे किसी के आयत्त - अधीन नहीं होते। एक दूसरे के वशगत रहना - अधीन रहना गृहस्थों का व्यवहार है जीवन पद्धति है । आप सत्पथ - अध्यात्म मार्ग और सद्भावपरमार्थ से अपगत हैं, वंचित हैं । संसार-चार गतियों में परिभ्रमण के आप पारगामी नहीं हैं आपका संसार में जन्म मरण - आवागमन मिट नहीं सकता । यह पूर्व पक्ष है । उसका दोष दिखलाते हुए कहते हैं अह ते परिभासेज्जा, भिक्खु तुब्भे एवं छाया मोक्खविसारए । पभासंता, दुपक्खं चेव सेवह ॥ ११ ॥ अथ तान् परिभाषेत, भिक्षु र्मोक्षविशारदः । एवं यूयं प्रभाषमाणाः दुष्पक्षञ्चैव सेवध्वम् ॥ ❀❀ अनुवाद अन्य मतवादियों द्वारा आक्षेप युक्त वचन कहे जाने पर मोक्ष विशारद मोक्ष धर्म के विवेचक, साधना निष्णात मुनि उनसे कहते कि आप लोग इस प्रकार आक्षेप लगाते हुए दुपक्ख दुष्पक्ष-असत्पक्षका सेवन कर रहे हैं, असत्य का प्रतिपादन कर रहे हैं । टीका- 'अथ' अनन्तरं 'तान्' एवं प्रतिकूलत्वेनोपस्थितान् भिक्षुः 'परिभाषेत्' ब्रूयात्, किम्भूतः ? 'मोक्ष विशारदो' मोक्षमार्गस्य सम्यग्दर्शनचारित्ररूपस्य प्ररूपकः, 'एवम्' अनन्तरोक्त यूयं प्रभाषमाणाः सन्तः दुष्टः पक्षो दुष्पक्षः असत्प्रतिज्ञाभ्युप्तगमस्तमेव सेवध्वं यूयं यदिवा- रागद्वेषात्मकं पक्षद्वयं सेवध्वं यूयं तथाहिसदोषस्याप्यात्मीयपक्षस्य समर्थनाद्रागो, निष्कलङ्कस्याप्यस्मदभ्युपगमस्य दूषणाद्वेषः, अथै (थवै) वं पक्षद्वयं यूयं तद्यथा वक्ष्यमाणनीत्या बीजोदकोद्दिष्टकृतभोजित्वाद्गृहस्थाः यतिलिङ्गाभ्युपगमात्किल प्रव्रजिताश्चेत्येवं पक्ष द्वयासेवनं भवतामिति, यदिवा स्वतोऽसदनुष्ठानमपरञ्च सदनुष्ठायिनां निन्दनमितिभावः ॥११॥ टीकार्थ- पूर्वोक्त रूप में प्रतिकूलता के साथ उपस्थित होने वाले, व्यवहार करने वाले अन्य मतवादियों साधु यों कहे । मोक्ष विशारद - मोक्ष मार्ग के सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चारित्र रूप मोक्ष दर्शन के प्ररूपक - व्याख्याता साधु पूर्वोक्त रूप में प्रतिकूलता के साथ उपस्थित - आक्षेपपूर्ण वचन भाषी अन्य मतवादियों से कहे कि यों बोलने वाले आप तो दुपक्ख- दुष्पक्ष का सेवन करते हैं दुष्ट-दोष युक्त पक्ष दुष्पक्ष कहा जाता है । उसका आशय असत् प्रतिज्ञा या सिद्धान्त का स्वीकार है । 232
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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