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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् परलोक को देखकर आया है । उन्होंने श्लोक भी कहा है-हे शोभने ! सुन्दर देहशीले ! उत्तमोत्तम पदार्थ खाओ, पीओ आनन्द करो । जो व्यतीत हो गया वह तुम्हारा नहीं है । हे भोली ! गई हुई वस्तु वापस लौटकर नहीं आती तथा यह शरीर भी पांच महाभूतों का समुदाय मात्र है । इसलिये हे भद्रे ! जितना दृष्टिगोचर होता है, उतना ही यह पुरुष है, आत्मा है । लोक है । परन्तु अबहुश्रुत-अज्ञानी लोग जिस प्रकार पृथ्वी पर मनुष्य के पदचिह्न को अंकित देखकर भेड़िये के पद चिह्न की असत्य कल्पना करते हैं। अदक्खुव दक्खुवाहियं, (तं) सद्दहसु अदक्खुदंसणा । हंदि हु सुनिरुद्धदंसणो मोहणिजेण कडेण कम्मुणा ॥११॥ छाया - अपश्यवत् ! पश्य व्याहृतं श्रद्वत्स्व अपश्य दर्शन । गृहाण सुनिरुद्ध दर्शनः मोहनीयेन कृतेन कर्मणा ॥ अनुवाद - हे अपश्यवत-चक्षु रहित अंधतुल्य अज्ञानी पुरुष तुम सर्वदृष्टा, सर्वज्ञाता भगवान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों में श्रद्धा करो, श्रद्धाशील बनो, अपश्यदर्शन-असर्वज्ञ पुरुषों द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को स्वीकार करने वाले पुरुषों, अपने आप द्वारा किये गये कर्म से जिसकी सम्यक् ज्ञानात्मक दृष्टि अवरुद्ध हो गई है वे सर्वज्ञ प्रतिपादित दर्शन-सिद्धान्तों को नहीं मानते, इसे समझो । टीका - एवमैहिकसुखाभिलाषिणा परलोकं निन्हुवानेन नास्तिकेन अभिहिते प्रत्युत्तरप्रदानायाह-पश्यतीति पश्यो न पश्योऽपश्योऽन्धस्तेन तुल्यः कार्यका-विवेचित्वादन्धवत्त स्यामंत्रणं हेऽपश्यवत् अन्धसद्दश ! प्रत्यक्षस्यैवैकस्याभ्युपगमेन कार्याकार्यानभिज्ञ ! पश्येन सर्वज्ञेन व्यहतम् उक्तं सर्वज्ञानगमं श्रद्धत्स्व प्रमाणीकुरु प्रत्यक्षस्यैवैकस्याभ्युपगमेन समस्तव्यवहार विलोपेनहन्त हेतोऽसि, पितृ निबन्धन स्याऽपि व्यवहारस्यासिद्धेरिति तथा अपश्यकस्य असर्वज्ञस्याभ्युपगतं दर्शनं येनासावपश्यकदर्शनस्तस्याऽऽमन्त्रणं हेऽपश्यकदर्शन ! स्तवोऽग्दिर्शी भवांस्तथाविधदर्शनप्रमाणश्च सन् कार्याका-विवेचितया अन्धवदभविष्यद् यदि सर्वज्ञाभ्युपगमं नाकरिष्यत् यदि वा अदक्षो वा अनिपुणो वा दक्षो वा निपुणो वा यादृश स्तादृशो वा अचक्षुर्दर्शनमस्यासावचक्षुर्दर्शनः केवलदर्शनः सर्वज्ञस्तस्याद्यदवाप्यते हितं तत् श्रद्धत्स्व इदमुक्तं भवति अनिपुणेन निपुणेन वा सर्वज्ञदर्शनोक्तं हितं श्रद्धातव्यम्। यदिवा हेऽदृष्ट ! हे अग्दिर्शन ! द्रष्ट्रा अतीतानागतव्यवहितसूक्ष्मपदार्थदर्शिना यद् व्याहतम् अभिहितम् आगमे तत् श्रद्धत्स्व हे अदृष्टदर्शन ! अदक्षदर्शन ! इति वा असर्वज्ञोक्तशासनानुयायिन् । तमात्मीयमाग्रहं परित्यज्य सर्वज्ञोक्ते मार्गे श्रद्धानं कुर्विति तात्पर्य्यार्थ । किमिति सर्वज्ञोक्ते मार्गे श्रद्धानमसुमान्न करोति येनैवमुपदिश्यते? तिन्निमित्तमाह-हंदीत्येवंगृहाण हु शब्दो वाक्यालङ्कारे सृष्टु अतिशयेन निरुद्ध मावृतं दर्शनं सम्यगवबोधरूपं यस्य स तथा केनेत्याह-मोहयतीति मोहनीयं मिथ्यादर्शनादि ज्ञानावरणादिकं वा तेन स्वकृतेन कर्मणा निरुद्ध दर्शनः प्राणी सर्वज्ञोक्तं मागं न श्रद्धते अतः सन्मार्ग श्रद्धानम्प्रति चोद्यत इति ॥११॥ टीकार्थ – सांसारिक सुख की अभिप्सा करने वाले तथा परलोक को असत्य कहने वाले नास्तिकवादी के कथन का उत्तर देते हुए आगमकार कहते हैं - जो देखता है, उसे पश्य कहा जाता है । जो नहीं देखता-अन्धा है उसे अपश्य कहा जाता है । जो पुरुष कार्य-करने योग्य, अकार्य-न करने योग्य के विवेचित्व-विचार या चिन्तन से शून्य है, वह एक अंधे -186)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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