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________________ वैतालिय अध्ययनं ) नहीं हो तो ये दुर्जेयता सबके लिये लागू हो जाय । दुर्जेय कौन है ? कहा गया है-ग्रामधर्म दुर्जय है । 'शब्द' आदि विषय एवं अब्रह्मचर्य आदि को ग्राम धर्म कहा गया है । अतएव आर्यसुधर्मा कहते हैं कि मैंने यह सुना है । तीर्थंकर ऐसा प्रतिपादित करते रहे हैं कि ग्रामधर्म दुर्जेय है । यह सब जो पहले प्रतिपादित हुआ, नाभि के पुत्र भगवान ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को उद्दिष्टकर निरूपित किया था । तत्पश्चात् श्री सुधर्मास्वामी आदि पश्चातवर्ती गणधरों ने अपने शिष्यों को बतलाया था । इसीलिये मैंने यह सुना है, ऐसा जो संकेत किया है उसमें कोई दोष नहीं है । ऐसा समझना चाहिये । यहां 'जंसी-यस्मिन्' इस पद में कर्म में ल्यप् का लोप होकर पंचमी या सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है, इसके अनुसार यहां यह अभिप्राय है कि जो पुरुष इन ग्राम धर्मों या विषय भोगों से निवृत्त है, अथवा यहां पंचमी के अर्थ में सप्तमी होने से इसका अभिप्राय यह है कि इन ग्राम धर्मों से जो निवृत्त हैं और संयम में सम्यक् समुत्थित हैं । वे आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव द्वारा संप्रवृत्त तथा चरम तीर्थंकर प्रभु महावीर द्वारा प्रतिपादित धर्म का अनुसरण करते हैं । इसका यह आशय जे एय चरंति आहियं नाएणं महया महे सिणा । ते उट्ठिय ते समुठिया अन्नोन्नं सारंति धम्मओ ॥२६॥ छाया - य एनं चरन्त्याख्यातं, ज्ञातेन महता महर्षिणा । ते उत्थितास्ते समुत्थिता अन्योऽन्यं सारयन्ति धर्मतः ॥ अनुवाद - जो पुरुष महान महर्षि-परम उच्च कोटि के दृष्टा, ज्ञाता-सर्वदर्शी, सर्वज्ञानी ज्ञातपुत्र-ज्ञातवंशीय, क्षत्रिय कुल में उत्पन्न भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित धर्म का परिपालन करते हैं वे ही साधना के मार्ग में उत्थित-उठे हुए हैं, समुत्थित-सम्यक् उस दिशा में उद्यमशील हैं वे ही धर्म के पथ से हटने की स्थिति में एक दूसरे को धर्म में टिके रहने की प्रेरणा देते हैं । ___टीका - किञ्च ये मनुष्या एनं प्रागुक्तं धर्मं ग्रामधर्म-विरतिलक्षणं चरन्ति कुर्वन्ति आख्यातं ज्ञातेन ज्ञातपुत्रेण 'महये' त्ति महावियस्य ज्ञानस्यानन्य भूतत्वान्महान् तेन तथाऽनुकूलप्रतिकूलोपसर्गसहिष्णुत्वान्महर्षिणा श्री वर्धमानस्वामिना आख्यातं धर्मं ये चरिन्त तएव संयमोत्थानेन कुतीर्थिक परिहारेणोत्थिताः तथा निह्नवादिपरिहारेण तएव सम्यक् कुमार्गदेशना परित्यागेनोत्थिताः समुत्थिता इति, नाऽन्ये कुप्रावचनिकाः जमालिप्रमृतयश्चेति भावः त एव च यथोक्तधर्मानुष्ठायिनः अन्योऽन्यं परस्परं धर्मतो धर्ममाश्रित्य धर्मतो वा भ्रश्यन्तं सारयन्ति चोदयन्ति पुनरपि सद्धर्मेप्रवर्तयन्तीति ॥२६॥ टीकार्थ - केवल ज्ञान का विषय महान है-अत्यन्त विस्तृत है, ज्ञान ज्ञानी से भिन्न नहीं होता। इस अपेक्षा से केवल ज्ञान और महावीर की वास्तव में भिन्नता सिद्ध नहीं होती । अतएव भगवान महावीर को महान कहा गया है । ऐसी ज्ञानमयी महत्ता से युक्त अनुकूल और प्रतिकूल उपसर्गों को सहिष्णुतापूर्वक सहन करने वाले ज्ञातवंशीय प्रभु वर्धमान ने ग्राम धर्मों के परिवर्जन का उपदेश देते हुए सद्धर्म का निरूपण किया है । उसका जो अनुसरण करते हैं मिथ्यासिद्धान्तों के प्ररूपक अन्यतीर्थियों द्वारा प्रतिपादित धर्म का त्याग करते हैं वे ही यथार्थतः संयम में सम्यक् धर्म में संप्रवृत्त हैं । वे ही साधक निन्हवों द्वारा-मिथ्यातत्त्व प्ररूपकों द्वारा ( 171
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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