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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः अनुवाद अपने-अपने सिद्धान्तों के उपस्थान-अनुष्ठान उनके अनुसरण से ही सिद्धि प्राप्त होती है । किसी अन्य प्रकार से नहीं । मोक्ष प्राप्ति से पहले मनुष्य को वशवर्ती-अपनी इंद्रियों व मन को वश में कर रहना चाहिये । इस प्रकार उसकी समस्त कामनाएं - इच्छाएं पूर्ण होंगी । - टीका पुनरन्यथा कृतवादिमतमुपदर्शयितुमाह ते कृतवादिनः शैवैक दण्डि प्रभृतयः स्वकीये स्वकीये उपतिष्ठन्त्यस्मिन्नित्युपस्थानं स्वीकयमनुष्ठानं दीक्षा गुरु चरण शुश्रूषादिकं तस्मिन्नेव सिद्धिम् अशेष सांसारिकप्रपञ्चरहितस्वभावामभिहितवन्तो नान्यथा नाऽन्येन प्रकारेण सिद्धिरवाप्यत इति तथाहि - शैवाः द एव मोक्ष इत्येवं व्यवस्थिताः एकदण्डिकास्तु पञ्चविंशतितत्त्वपरिज्ञानान्मुक्तिरित्यभिहितवन्तः तथाऽन्येऽपि वेदान्तिकाः ध्यानाध्ययनसमाधिमार्गानुष्ठानात् सिद्धिमुक्तवन्त इत्यवमन्येऽपि यथास्वं दर्शनान्मोक्षमार्गं प्रतिपादयन्तीति । अशेष द्वन्द्वोपरमलक्षणायाः सिद्धि प्राप्ते रधस्तात् प्रागपि यावदद्यापि सिद्धिप्राप्ति न भवति तावदिहैव जन्मन्यस्मदीयदर्शनोक्तानुष्ठानानुभावादष्टगुणैश्वर्य्यं सद्भावो भवतीति दर्शयति आत्मवशे वर्तितुं शीलमस्येति वशवर्ती वशेन्द्रिय इत्युक्तम्भवति । नह्यसौ सांसारिकैः स्वभावैरभिभूयते सर्वे काम । अभिलाषा अर्पिताः सम्पन्ना यस्य स सर्वकामसमर्पितो यान् यान् कामान् कामयते तेऽस्य सर्वे सिद्धयन्तीति यावत्, तथाहि सिद्धेरारादष्टगुणेश्वर्य्यलक्षणा सिद्धि र्भवति । तद्यथा अणिमा, लघिमा महिमा प्राकाभ्य मीशित्वं वशित्वमप्रतिघातित्वं यत्र कामा वसायित्वमिति ॥१४॥ टीकार्थ - आगमकार कृतवादियों के सिद्धान्त को अन्यथा - एक और प्रकार से बताने हेतु कहते हैंवे कृतवादी शैव- शिव को परम देव मानने वाले तथा एक दण्डी - एक दण्ड रखने वाले आदि अपने अपने सिद्धान्तों का यों प्रतिपादन करते हैं कि स्वीय अनुष्ठान अपने धार्मिक उपक्रम, दीक्षा ग्रहण करना, गुरु चरणों की सेवा करना आदि अपने अपने अनुष्ठानों से ही मनुष्य समग्र सांसारिक प्रपंचों-झंझटों या दुः खों से रहित होकर मोक्ष प्राप्त करता है । किसी अन्य प्रकार के अनुष्ठान से सिद्धि प्राप्त नहीं होती (शैव मतानुयायी दीक्षा से ही मुक्ति स्वीकार करते हैं तथा एक दण्डी पच्चीस तत्त्वों के ज्ञान से मोक्ष होना स्वीकार करते हैं-प्रतिपादित करते हैं । अन्य वेदान्ती यों निरुपण करते हैं कि ध्यान, अध्ययन तथा समाधि का अभ्यासअनुष्ठान करने से सिद्धि प्राप्त होती है । इसी प्रकार अन्यान्य दार्शनिक सिद्धान्तों में विश्वास करने वाले व्यक्ति अपने-अपने सिद्धान्तों को मोक्ष का पक्ष उनके अनुसरण से मोक्ष प्राप्त होना बतलाते हैं । वे कहते हैं कि मोक्ष-जहां सब प्रकार के द्वन्द्व-दुःख समाप्त हो जाते हैं, के पूर्व इसी जन्म में हमारे सिद्धान्तों के अनुसरणअनुपालन से आठ प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त सिद्धि प्राप्त होती है । आगमकार इसी बात को यों कहते हैंजो व्यक्ति आत्मवश-अपने वश में या नियन्त्रण में रहता है, जो इन्द्रियों के वश में नहीं होता, वह पुरुष सांसारिक स्वभाव से अभिभूत-सांसारिक स्थितियों से प्रभावित नहीं होता । उसके सब काम - अभिलाषाएं पूर्ण होती है। वह पुरुष जो जो काम-कामनाएं - इच्छाए करता है वे सब सफल हो जाती हैं । उस व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होने से पूर्व आठ प्रकार की ऐश्वर्य शालिनी सिद्धियां उपलब्ध होती है जो अणिमा - अपनी देह को परमाणुओं के सदृश सूक्ष्म बना देना, लघिमा अपनी देह को रूई के समान हल्का बना लेना, महिमा - अपनी देह को बड़ी से बड़ी कर लेना, प्राकाम्य-अपनी इच्छा को सफल करना ईषित्व - देह और मन पर पूरा अधिकार या नियंत्रण पा लेना, वशित्व - प्राणियों को अपने वश में कर लेना, अप्रतिघातित्व- किसी भी वस्तु द्वारा न रोका जा सकना तथा यत्रकामावशायित्व- जिस वस्तु का भोग करने की इच्छा हो, उसे इच्छापूर्ति तक नष्ट न होने देना, इस प्रकार है । - 111
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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