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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् टीका - एतान् पूर्वोक्तान् वादिनोऽनुचिन्त्य मेधावी प्रज्ञावान् मर्यादाव्यवस्थितो वा एतदवधारयेत् यथा-नैते राशित्रयवादिनो देवोप्तादिलोक वादिनश्च ब्रह्मचर्ये तदुपलक्षिते वा संयमानुष्ठाने वसेयुः अवतिष्ठेरन्निति। तथाहि-तेषामयमभ्युपगमो यथा स्वदर्शनपूजानिकारदर्शनात् कर्म बंधो भवति एवञ्वावश्यं-तदर्शनस्य पूजया तिरस्कारे ण वोभयेन वाभाव्यं तत्सम्भवाच्च कर्मोपचयस्तदुपचयाच्च शुद्धयभावः शुद्धयभावाच्च मोक्षाभावः । न च मुक्तानामपगताशेषकर्मकलङ्काना कृतकृत्यानामवगताशेषय-थावस्थितवस्तुतत्त्वाना समस्तुति निन्दानामपगतात्मात्मीयपरिग्रहाणां रागद्वेषानुषङ्गः तदभावाच्च कुतः पुनः कर्मबन्धः ? तद्वशाच्च संसारावरतरणमित्यर्थः । अतस्ते यद्यपि कथञ्चिद् द्रव्यब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता स्तथापिसम्यगज्ञानाभावान्न ते सम्यगनुष्ठानभाज इति स्थितम् । अपि ‘च सर्वेऽप्येतेप्रावादुकाः स्वकं स्वकम् आत्मायमात्मीयं दर्शनं स्वदर्शनानुरागादाख्यातारः शोभननत्वेन प्रख्यापयितार इति नच तत्र विदितवेद्येनास्था विधेयेति ॥१३॥ . टीकार्थ - इन पूर्वोक्त प्रावादुकों पर, उनके सिद्धान्तों पर अनुचिन्तन कर-विचारकर बुद्धिमान पुरुषज्ञानी व्यक्ति यह निश्चय करे कि ये त्रैराशिकवादी-आत्मा की तीन राशियां या अवस्थाएं मानने वाले एवं इस लोक को देवोप्त-देव द्वारा रचित माने वाले ब्रह्मचर्य में अथवा संयम के अनुसरण-अनुपालन में संलग्न नहीं हैं । इन लोगों का यह अभ्युपगम-मन्तव्य है कि अपने धर्म शासन की-सम्प्रदाय की पूजा प्रशस्ति, प्रतिष्ठा तथा निकार-तिरस्कार या अवहेलना देखने से मुक्त जीवों को कर्मों का बंध होता है किन्तु स्थिति यह है कि इनके दर्शन की पूजा-कीर्ति, प्रशस्ति तथा निकार-तिरस्कार या अपमान ये दोनों ही हुए बिना नहीं रहते-कहीं न कहीं तो होते ही रहते हैं और वैसा होने पर कर्म का उपचय-संग्रह या बंध अवश्य होगा । कर्मोपचय से शुद्धि का अभाव होगा-शुद्धि मिटेगी । शुद्धि का अभाव या अपगम होने से मोक्ष का भी अभाव होगा-मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकेगा । अतः यह सिद्धान्त समीचीन नहीं है क्योंकि जिनके समस्त कलंक-कालिमा नष्ट हो गई है तथा जो समग्र पदार्थों का सच्चा स्वरूप जानते हैं, जो कृतकृत्य हो चुके हैं जिन्हें जो करना था, वह सब कर चुके हैं, जो स्तुति तथा निंदा को एक समान समझते हैं, यह मैं हूं-यह मेरा है ऐसा परिग्रहात्मक भाव जिनका अपगत हो चुका है, ऐसे मुक्त जीवों में राग द्वेष उत्पन्न होना कभी संभव नहीं होता । जब उनमें रागद्वेष हीन हो-तो कर्मबंध कैसे हो सकता है । कर्मबंध न होने से मोक्षगत जीव पुनः संसार में कैसे आ सकते हैं। अतएव इस असत् या मिथ्या सिद्धान्त में विश्वास करने वाले वे परमतवादी यद्यपि द्रव्य रूप में कथञ्चित् संयम का अनुपालन करते हैं किन्तु ज्ञान के सम्यक् न होने पर वे जिसमें प्रवृत्त हैं, वह अनुष्ठान भी संयम अपने अपने दर्शन-सिद्धान्तों के प्रति अनुराग होने के कारण ये सभी ऐसा कहते हैं कि हमारे सिद्धान्त सबसे अच्छे हैं किन्तु विदितवेद्य-जानने योग्य तत्त्व को जिसने जान लिया हो-वस्तु स्वरूप को यथावत रूपेण समझ लिया हो. उसको इन मतवादियों के सिद्धान्तों में श्रद्धा नहीं करनी चाहिये । सए सए उवट्ठाणे, सिद्धिमेव न अन्नहा । अहो इहेव वसवत्ती सव्वकामसमप्पिए ॥१४॥ छाया - स्वके स्वके उपस्थाने सिद्धिमेव नान्यथा । अथ इहैव वशवर्ती सर्वकाम समर्पितः ॥ -110)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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