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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः) ___टीका - अधुनैतदुषयितुमाह - किञ्च-इह अस्मिन् मनुष्यभवे प्राप्तः सन् प्रव्रज्यामभ्युपेत्य संवृतात्मायम नियमरतो जातः सन् पश्चादपापो भवति-अपगताशेषकर्म कलङ्को भवतीति भावः । ततः स्वशासनं प्रज्वाल्य मुक्त्यवस्थो भवति । पुनरपि स्वशासनपूजादर्शनान्निकारोपलब्धेश्च रागद्वेषोदयात् कलुषितान्तरात्मा विकटाम्बुवद् उदकवन्नीरजस्कं सद्वातोद्धतरेणुनिवहसम्पृक्तं सरजस्कं-मलिनं भूयो यथा भवति तथाऽयमप्यात्माऽनन्तेन कालेन संसारो द्वेगाच्छुद्वाचारवस्थो भूत्वा ततो मोक्षावाप्तौ सत्यामकर्मावस्थो भवति । पुनः शासनपूजानिकारदर्शनाद्रागद्वेषोदयात् सकर्मा भवतीति । एवं त्रैराशिकानां राशित्रयावस्थो भवत्यात्मेत्याख्यातम् । उक्तञ्च "दग्धेन्धनः पुनरुपैति भवं प्रमथ्य, निर्वाणमप्यनवधारितभीरूनिष्ठम् । मुक्तः स्वयं कृतभवश्च परार्थशूरस्त्वच्छासनप्रतिहतेष्विह मोहराज्यम् ? ॥१२॥ टीकार्थ - अब आगमकार इस मत को दोषमुक्त बताने हेतु कहते हैं - जो प्राणी मनुष्य जीवन प्राप्त कर प्रव्रज्या-दीक्षा स्वीकार करता है संवृतात्मा-संवर युक्त यम नियम निरत होता है । पश्चात् वह अपाप-पाप रहित हो जाता है । उसका समस्त कर्मकलंक-कर्मदोष मिट जाता है-वह कर्मावरण रहित हो जाता है । इसके पश्चात् अपने शासन को-धर्म संघ को प्रवज्वलित कर-उज्जवल बनाकर उसकी प्रभावना कर मुक्तावस्था पा लेता है, किन्तु फिर अपने धर्म शासन की पूजा प्रतिष्ठा सम्मान देखकर रागयुक्त होता है तथा तिरस्कार या अपमान देखकर द्वेष युक्त होता है । इस प्रकार राग द्वेष के उत्पन्न होने से उसकी आत्मा कलुषित होती है । जैसे निर्मल जल पहले स्वच्छ होता है, फिर वह हवा के द्वारा उडाये गये रजकणों के संयोग से मलिन-गंदा हो जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि अनन्त काल के अनन्तर जीव संसार से विरत होकर शुद्ध आचार के परिपालन में संलग्न होता है तथा वैसा होता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त करता है-कर्म रहित हो जाता है किन्तु वह पुनः अपने शासन या सम्प्रदाय की प्रशस्ति देखकर राग करता है तथा अवहेलना देखकर द्वेष करता है । राग द्वेष के कारण वह कर्म सहित हो जाता है । इस प्रकार त्रैराशिक सिद्धान्त में आत्मा तीन राशियों या अवस्थाओं को प्राप्त करती है । कहा गया है - हे प्रभु ! आपके शासन को नहीं मानने वाले पुरुषों पर मोह का कैसा साम्राज्य छाया है । वे अज्ञानी निरुपित करते हैं कि मुक्त-कर्मों से छूटा हुआ जीव पुनः संसार में आता है । मोह के प्रभाववश ही वे ऐसा कहते हैं । जो काठ जल जाता है, वह पुनः नहीं जलता। इसी प्रकार संसार का प्रमथनकर जो जीवमुक्त हो जाता है, वह फिर संसार में नहीं आता किन्तु वे अन्य सैद्धान्तिक ऐसा मानते हैं कि मुक्त होने पर भी जीव पुनः संसार में आता है, कैसा आश्चर्य है । ऐसे लोग दूसरे को मुक्ति दिलाने का दुःसाहस करते हैं। एताणुवीति मेहावी, बंभचेरेण ते वसे । पुढोपावाउया सव्वे, अक्खायारो सयंसयं ॥१३॥ छाया - एताननुचिन्त्य मेघावी, ब्रह्मचर्ये न तेवसेयुः । पृथक् प्रावादुकाः सर्वे आख्यातारः स्वकं स्वकम् ॥ अनुवाद - मेधावी-बुद्धिमान-धर्मतत्त्ववेत्ता इन अन्य तीर्थियों के सिद्धान्तों पर अनुचिन्तन कर यह निश्चित माने कि ये ब्रह्मचर्य-संयम का पालन नहीं करते हैं तथा ये सभी प्रावादुक-अपने वाद को ही यथार्थ मानते हुए उसे प्रतिपादित करते हैं, उत्तम बतलाते हैं । 109
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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