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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् टीका साम्प्रतं प्रकारान्तरेण कृतवादिमतमेवोपन्यस्यन्नाह - इह अस्मिन् कृतवादिप्रस्तावे त्रैराशिका : गोशालक मतानुसारिणो येषामेकविंशतिसूत्राणि पूर्वगत त्रैराशिकसूत्रपरिपाट्या व्यवस्थितानि । ते एवं वदन्ति यथाऽयमात्मा शुद्धो मनुष्यभव एवशुद्धाचारो भूत्वा अपगताशेषमलकलङ्की मोक्षेऽपापको भवति - अपगता शेषकर्मा भवतीत्यर्थः । इदमेकेषां गोशालकमतानुसारिणामाख्यातम् । पुनरसावात्मा शुद्धत्वाकर्मकत्व राशिद्वयावस्थो भूत्वा क्रीडया प्रद्वेषेणवा स तत्र मोक्षस्थ एव अपराध्यति रजसा श्लिष्यते । इदमुक्तं भवति तस्य हि स्वशासन पूजा मुपलभ्यान्यशासनपराभव श्चोपलभ्य क्रीडोत्पद्यते - प्रमोद : सञ्जायते, स्वशासनन्यक्कार दर्शनाच्च द्वेषः, ततोऽसौ क्रीडाद्वेषाभ्यामनुगतान्तरात्मा शनैः शनैर्निर्मलपटवदुपभुज्य मानो रजसा मलिनीक्रियते । मलीयसश्च कर्मगौरवाद्भूयः संसारेऽवतरति । अस्याञ्चावस्थायां सकर्मकत्वा तृतीयराश्यवस्थो भवति ॥ ११ ॥ टीकार्थ अब आगमकार एक अन्य प्रकार से कृतवादियों के मत को प्रतिपादित करते हुए बतलाते हैं - यहां - इस जगत में जो आत्मा की तीन राशियां या अवस्थाएं बतलाते हैं उन्हें त्रैराशिक कहा जाता है। गौशालक के सिद्धान्तानुयायी ऐसा आत्मा की तीन राशियां मानते हैं। इन श्रमणों के पूर्वगत त्रैराशिक सूत्रों की परिपाटी के अनुरुप इक्कीस सूत्र हैं। वे ऐसा कहते हैं कि यह आत्मा मनुष्य भव-मानव की योनि में ही शुद्ध आचारवान होकर समग्र मल कलंक - कर्मकालिमा से विमुक्त होकर निष्पाप हो जाती है । मोक्ष पा लेती है । उसके समस्त कर्म अपगत हो जाते हैं। ऐसा कतिपय गौशालक मत अनुयायी प्रतिपादित करते हैं। इस तरह वह आत्मा शुद्धत्त्व, अकर्मत्व रूप दो राशियों में अवस्थाओं में स्थित होकर पुनः राग अथवा द्वेष के कारण मोक्ष में ही कर्मरज से कार्मण पुद्गलों से लिप्त हो जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि उसे अपने शासन, धर्म सम्प्रदाय की पूजा-सत्कार और दूसरों के धर्म सम्प्रदाय का तिरस्कार अनादर देख कर प्रमोद हर्ष उत्पन्न होता है तथा अपने धर्म सम्प्रदाय का तिरस्कार देखकर द्वेष होता है। इस प्रकार वह आत्मा राग द्वेष से लिप्त हो जाती है । जैसे उपभोग करने से काम में लेने से निर्मल वस्त्र - साफ कपड़ा मलिन हो जाता है, उसी प्रकार क्रमशः वह आत्मा कर्मों की रज से कर्म पुद्गलों से मलिन हो जाती है । यों कर्म मलिन होकर आत्मा कर्मों के भारीपन के कारण पुनः संसार में अवतरित होती है - जन्म लेती है। इस अवस्था में, कर्म युक्त होने के कारण आत्मा तीसरी राशि की अवस्था को अर्थात् सकर्मावस्था - कर्मयुक्त अवस्था को पा है । इह संवुडे मुणी जाए, पच्छा होइ अपावए । वियडंबु जहा भुज्जो, नीरयं सरयं तहा ॥१२॥ छाया - इह संवृतो मुनिर्जातः पश्वाद्भवत्यपापकः । विकटाम्बु यथा भूयो नीरजस्कं सरजस्कं तथा ॥ अनुवाद - कोई एक प्राणी इस संसार में - मनुष्य जीवन में संवृत-संवर, यम नियम युक्त होता हुआ अपापक- पापरहित मुनि धर्म अपनाता है, किन्तु जैसे स्वच्छ पानी आगे जाकर मलिन-गंदा हो जाता है । उसी प्रकार वह पुरुष भी पापाचरण से मलिन हो जाता है । 108
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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