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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः टीका इदानीमेतेषामेव देवोप्तादिवादिनामज्ञानित्वं प्रसाध्य तत्फलदिदर्शयिषयाऽऽह - मनोऽनुकूलं मनोज्ञं-शोभनमनुष्ठानं न मनोज्ञ ममनोज्ञम् असदनुष्ठानं तस्मादुत्पादः प्रादुर्भावो यस्य दुःखस्य तदमनोज्ञसमुत्पादम्, एवकारोऽवधारणे, स चैवं संबन्धनीयः अमनोज्ञसमुत्पादमेव दुःखमित्येवं विजानीयादवगच्छेत्प्राज्ञः । एतदुक्तम्भवतिस्वकृतासदनुष्ठानादेव दुःखस्योद्भवो भवति नान्यस्मादिति, एवं व्यवस्थितेऽपि सति अनन्तरोक्तवादिनोऽसदनुष्ठानोद्भवस्य दुःखस्य समुत्पादमजानानाः सन्तोऽन्यत ईश्वरादे दुःखस्योत्पादमिच्छन्ति, ते चैव मिच्छन्तः कथं केन प्रकारेण दुःखस्य संवरं दुःखप्रतिघात हेतुं ज्ञास्यन्ति । निदानोच्छेदेन हि निदानिन उच्छेदो भवति । ते च निदानमेव न जानन्ति, तच्चाजानानाः कथं दुःखोच्छेदाय यतिष्यन्ते ? यत्नवन्तोऽपि च नैव दुःखोच्छेदनमवाप्स्यन्ति, अपि तु संसार एव जन्मजरामरणेष्ट वियोगाद्यनेक दुःखव्राताघाताः भूयोभूयोऽरहदृघटीन्यायेनानन्तमपि कालं संस्थास्यन्ति ॥ १० ॥ का इस समय देवोप्तवाद आदि में विश्वास रखने वाले अन्यतीर्थिकों का अज्ञानित्व - अज्ञानी पन सिद्ध कर अब आगमकार उनको जो फल प्राप्त होता है, उसका दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं I 1 जो मन के अनुकूल - मन को अच्छा लगने वाला होता है, उसे मनोज्ञ कहते हैं । मनोज्ञ का तात्पर्य. शोभन -सुहावना या सुन्दर है । जो मनोज्ञ नहीं है उसे अमनोज्ञ कहा जाता है, अमनोज्ञ का अर्थ असत् अनुष्ठान या अशुभ कर्म है । जिस अमनोज्ञ कर्म या असत् अनुष्ठान से जो उत्पन्न होता है उसे अमनोज्ञ समुत्पाद कहा जाता है ।‘एवं' शब्द यहां अवधारणा के अर्थ में है । उसका सम्बन्ध इस तरह जोड़ना चाहिये -असत् अनुष्ठान या अशुभ कर्म करने से ही दुःख पैदा होता है । ज्ञानी या बुद्धिमान को यह समझना चाहिये -इसका अभिप्राय यह है कि अपने द्वारा कृत-आचारित असत् अनुष्ठान - अशुभ कर्म से ही दुःख की निष्पत्ति होती है । किसी अन्य से नहीं होती । ऐसी स्थिति होने के बावजूद पूर्व वर्णित मतवादी ऐसा नहीं मानते कि असत् अनुष्ठान से दुःख उत्पन्न होता है । ईश्वर आदि अन्य पदार्थों हेतुओं द्वारा दुःख का उत्पन्न होना मानते हैं । इस प्रकार दुःख का निष्पन्न होना मानने वाले दुःख के विनाश का कारण कैसे जान सकते हैं। कार्य का नाश तभी होता है जब कारण का नाश हो, किन्तु वे अन्य सैद्धान्तिक दुःखोत्पत्ति के यथार्थ हेतु को नहीं जानते, जब वे दुःख के कारण को नहीं जानते तो दुःख के उच्छेद के लिये किस प्रकार प्रयत्न कर सकते हैं । यदि वे दुःख नाश का प्रयत्न भी करें तो उनका दुःख मिट नहीं सकता । वरन् जन्म, वृद्धावस्था, मृत्यु, प्रिय वियोग आदि अनेक प्रकार के दुःख समूह आहत होते हुए वे ' अरहट्टघट्टी न्याय' से अनवरत चक्कर काटने वाले रहंट के घड़ों की तरह अनन्तकाल तक संसार में पड़े रहेंगे । - सुद्धे पुणो छाया - इहमेगेसिमाहियं । अवरज्झई ॥११॥ अपावए आया, किड्डापदोसेणं सो तत्थ शुद्धोऽपापक आत्मा, इहैकेषामाख्यातम् । पुनः क्रीडाप्रद्वेषेण स तत्रापराध्यति ॥ अनुवाद - किन्हीं मतवादियों का इस संसार में ऐसा मन्तव्य है कि आत्मा शुद्ध है, अपापक- पापरहित है, किन्तु वह क्रीडाप्रद्वेष- राग तथा द्वेष भाव के कारण अपराध करती है-कर्म बद्ध होती है । 107
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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