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________________ ww જયદેવ भगवान आचार्य श्री अनन्तकीर्तिजी दर्शन साहित्यके ज्ञाता कई अनन्तकीर्ति आचार्योंमें आप अपने में अनुठे हैं। आपने 'बृहत्सर्वज्ञसिद्धि' व 'लघुसर्वज्ञसिद्धि' नामक दो ग्रंथोकी रचना करके, दिगम्बर जैन साहित्य में अपनी अमीट सुगँधको महकाकर जैन जगतमें आप अमर वरदानरूप हुए हैं। (146) आप अपने युगके प्रख्यात तार्किक विद्वान आचार्य थे। आपने स्वप्नज्ञानको मानस प्रत्यक्ष ज्ञान माना है। आपके ग्रंथमें सन्मतितर्कके टीकाकार आचार्य अभयदेवसूरि व आचार्य विद्यानन्दस्वामीकी छाप स्पष्ट प्रतिबिम्बित होती है। आपकी महिमा ध्यानस्थ आचार्य अनन्तकीर्तिजी आपके पश्चात्वर्ती आचार्य वादिराजने भी गाई है। विद्वानोंके मतानुसार आप भगवान आचार्य विद्यानंदीजीके समवर्ती प्रतीत होते हैं । आपके समय के बारेमें विविध विद्वान अलग-अलग मत रखते हैं, फिर भी आप ईसाकी ८वीं शताब्दी के उत्तरार्धवर्ती आचार्य हैं, ऐसा आपका समय माननेमें कोई दो मत नहीं है । 'सर्वज्ञकी सिद्धि करनेमें निपुण' आचार्य अनंतकीर्तिदस्वामीको कोटि कोटि वंदन |
SR No.032436
Book TitleBhagwan Mahavir Ki Acharya Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Swadhyay Mandir Trust
PublisherDigambar Jain Swadhyay Mandir Trust
Publication Year2013
Total Pages242
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size35 MB
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