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जैन धर्म की कहानियाँ भाग-८/२३ अभिमान चूर-चूर हो गया । सती के पुण्य-प्रताप (शील-प्रताप) से वनदेवी वहाँ प्रगट हुई और दुष्ट राजा को फटकारते हुए कहने लगी“खबरदार.....! भूलकर भी इस सती को हाथ लगाना नहीं ।”
सिंह राजा तो वनदेवी को देख कर ही पत्थर जैसा हो गया, उसका हृदय भय से काँपने लगा । उसने क्षमा माँगी और तुरन्त ही सेवक को बुलाकर अनन्तमती को सम्मान पूर्वक वन में छोड़ कर आने को कहा ।
ऐसे अनजान वन में कहाँ जाऊँ? इसका अनन्तमती को कुछ पता नहीं था । इतने सारे अत्याचार होने पर भी अपने शील धर्म की रक्षा हुई, इसलिए सन्तोष पूर्वक घने वन में भी वह पंच परमेष्ठी का' स्मरण करते हुए आगे बढ़ने लगी । महान भाग्य से थोड़ी देर पश्चात् उसने आर्यिकाओं का संघ देखा । अत्यन्त उल्लसित होकर आनन्द पूर्वक वह आर्यिका माता की शरण में गई ।
अहो ! विषय-लोलुप संसार में जिसे कहीं शरण नहीं मिली, उसने वीतराग मार्गानुगामी साध्वी के पास शरण ली । उनके आश्रय में आँसू भरी आँखों से उसने अपनी बीती कहानी सुनायी उसे सुन कर भगवती माता ने वैराग्य पूर्वक उसे आश्वस्त किया और उसके शील की प्रशंसा की । भगवती माता के सान्निध्य में रह कर अनन्तमली शान्ति पूर्वक आत्म-साधना करने लगी । ____ इधर चम्पापुरी में जब से अनन्तमती को विद्याधर उठा कर ले गया था, तब ही से उसके माता-पिता बहुत दु:खी थे । पुत्री के वियोग से खेद-खिन्न होकर मन को शान्त करने के लिए वे तीर्थ यात्रा करने निकले और यात्रा करते-करते तीर्थंकर भगवन्तों की जन्मभूमि अयोध्या नगरी में पहँचे । प्रियदत्त का साला (अनन्तमती का मामा) जिनदत्त सेठ यहीं रहता था । वहाँ उसके घर आने पर आँगन में, एक सुन्दर रंगोली देख कर प्रियदत्त कहने लगे- “हमारी पुत्री अनन्तमती भी ऐसी ही रंगोली निकाला करती थी।"
उन्हें अपनी प्रिय पुत्री की याद आई, उनकी आँखों से आँसुओं