________________ 306 योगबिंदु योग की दिव्यदृष्टि का विरह होने से ही मनुष्य संसार में भटकता है, दुःख भोगता है / इसलिये आचार्यश्री भव्य प्राणियों के लिये योग की ऐसी दिव्यदृष्टि की प्रार्थना करते हैं। क्योंकि "परोपकाराय सत्तां विभूतयः", "जगा च कल्याणा संताची विभूति" | जगत कल्याण की कामना ही सन्तों की परम विभूति है। कितने समदर्शी, सर्वधर्म समन्वयी, उदार और सत्यान्वेषी सन्त है। शतशः वन्दन हो ऐसे महान् आचार्यश्री को / देह छतां जेहनी दशा, वर्ते देहातीत / ते ज्ञानीना चरणमां, हो वन्दन अगणीत // (आत्मसिद्धि-श्रीमद् राजचंद्र) देहसहित होते हुये भी जिनकी दशा देहातीत वर्तित होती है, ऐसे ज्ञानियों के चरणों में मेरे अगणित वंदन हों // 527 //