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________________ योगबिंदु 305 स्वल्पमत्यनुकम्पायै, योगशास्त्रमहार्णवात् / आचार्यहरिभद्रेण, योगबिन्दुः समुद्धृतः // 526 // अर्थ : आचार्य हरिभद्रसूरिजी ने स्वल्पमति-बालजीवों पर दया लाकर योगशास्त्र रूपी महासमुद्र में से यह योगबिन्दु शास्त्र उद्धृत-प्रकट किया है // 526 / / विवेचन : संसार के अल्पमति भव्य बालजीवों के लिये योगशास्त्र रूपी समुद्र का अवगाहन करना अशक्य है। उनमें इतनी शक्ति-सामर्थ्य नहीं कि वे इतने बड़े योगशास्त्र रूपी समुद्र में डुबकी लगाकर, योग का आनन्द प्राप्त कर सके क्योंकि उनकी मति अति अल्प है। इसलिये ऐसे मुमुक्षु भव्यात्माओं के लिये, दिल में अत्यन्त करुणाभाव लाकर, परम कृपालु भगवान श्रीहरिभद्रसूरिजी ने अनेक योगशास्त्रों रूपी समुद्र का अवगाहन करके उनमें से अच्छे-अच्छे पारमार्थिक वचनरूप बिन्दुओं को इकट्ठा करके, यह योगबिन्दु नामक शास्त्र तैयार किया है-उनमें से उद्धृत किया है / जिससे अल्पमति बालजीवों को भी योग का लाभ उपलब्ध हो सकें, वे भी योग को सुगमता से समझ कर जीवन में योग को स्थान दे सकें / उनके लाभ के लिये यह योगबिन्दु ग्रंथ तैयार किया है // 526 // समुद्धृत्यार्जितं पुण्यं, यदेन शुभयोगतः / भवान्थ्यविरहात् तेन, जनः स्ताद्योगलोचनः / / 527 // अर्थ : शुभयोग से (योगबिन्दु को) उद्धृत करके मैं ने (हरिभद्रसूरीजी ने) जो यह पुण्य अर्जित किया है उससे (पुण्यप्रताप से) भवरूपी अन्धकार से मुक्त होकर लोग योग रूपी लोचन वाले हों! विवेचन : 'योगबिन्दु' शास्त्र की पूर्णाहुति में आचार्य श्री हरिभद्रसूरिजी आशीर्वादरूप हार्दिक शुभेच्छा प्रकट करते हैं कि योगरूपी अगाध और अथाह समुद्र का अवगाहन करके मन, वचन और काया के शुभयोगों से मैंने जो शुभ-पुण्यानुबंधी पुण्य उपार्जित किया है अर्थात् योगबिन्दु की रचना करने से मुझे जो भी पुण्य मिले, उसके बदले में या उसके परिणाम स्वरूप मैं यही चाहता हूँ कि इस शास्त्र के अध्येता, आत्मकल्याण इच्छुक, मुमुक्षु, भाविकलोग राग, द्वेष, मोह, विषय, कषायरूप, अन्धकार जो संसार का बीजभूत है उससे मुक्त होकर, योगरूपी लोचन वाले हों तात्पर्य यह है कि वे संसार से उपर उठे और योगरूपी दिव्यदृष्टि उन्हें प्राप्त हो / आनन्दघनजी ने कहा है: चर्म नयनकरी मार्ग जोवता रे; भूल्यो सयल संसार / जेने नयने करी मार्ग जोइए रे; नयन ते दिव्य विचार // वस्तु विचारे रे दिव्यनयनतणो रे विरह पडयो निरधार / पथंडो निहालु रे बीजा जिन तणो रे //
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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