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________________ 266 योगबिंदु अर्थ : यह (निरात्मदर्शन) समाधिराज है, वही तत्त्वदर्शन है और आग्रहरूप मूर्छा को नष्ट करने में यही परम अमृत है / / 459|| विवेचन : निरात्मदर्शन याने अहं और मम का भाव जब मन से निकल जाता है, तन आत्मा अतिनम्र हो जाती है / तब जो ध्यान की स्थिति होती है, वह महान् समाधि है। क्योंकि समाधि में विघ्न डालने वाला अगर कोई शत्रु है तो वह अहंकार है। जब साधक का अहंकार नष्ट हो जाता है तब उसका मन स्थिर हो जाता है / और ऐसे स्थिर मन से जो ध्यान किया जाता है वह ध्यान की सबसे उत्कृष्ट स्थिति समाधिराज की कक्षा में आता है / इसी प्रकार जब अहंकार विलय हो जाता है तब वास्तविक तत्त्व "मैं कुछ नहीं, मेरा कोई नहीं" ऐसे परम सत्यतत्त्व का अनुभूत दर्शन होता है। जब मनुष्य का अहम्-भाव गया तो किसी भी प्रकार का आग्रह नहीं रहता। जब आग्रह, पक्ष, जिद, हठ, कदाग्रह समाप्त हो जाता है तो फिर परम अमृत-मोक्ष की प्राप्ति होती है / अतः बौद्धों के मत से निरात्मदर्शन-निरहंकार अवस्था ही परम-समाधि, श्रेष्ठतत्त्वदर्शन और अमृत-मोक्षप्राप्ति है // 459 // तृष्णा यज्जन्मनो योनिर्बुवा सा चात्मदर्शनात् / तदभावान्न तद्भावस्तत् ततो मुक्तिरित्यपि // 460 // अर्थ : जन्म का मूल कारण जो तृष्णा है वह आत्मदर्शन से दृढ होती है और उसके (आत्मदर्शन) अभाव से उसका (तृष्णा का) अभाव और उससे (तृष्णा के अभाव से) मुक्ति सिद्ध होती है // 460 // विवेचन : बौद्धों का मानना है कि जगत के पदार्थों को प्राप्त करने की अभिलाषा-लोभरूप जो तृष्णा है, वही संसार में जन्म-मरण करवाती है / इसलिये पुनर्भवरूप संसार का मूल कारण तृष्णा है / वह तृष्णा आत्मदर्शन से अर्थात् "मैं राजा, मैं सेठ, मैं इस सम्पति का स्वामी, मैं इस पद्मिनि का पति, मेरा राज्य, मेरी यशकीर्ति", यह "मैं" और यह "मेरा", ऐसा मैं और मेरा रूपपरिभाषा वाला, जो आत्मदर्शन में और मेरे पन की बुद्धि से देखा जाने वाला अपना स्वरूप है वह अवश्य ही तृष्णा को बल देता है; उसे दृढ़ मजबूत करता है। परन्तु ऐसे आत्मदर्शन के अभाव में, अर्थात् मैं और मेरे के अभावरूप अनात्म दर्शन से, तृष्णा का भी अभाव हो जाता है / तृष्णा नष्ट हो जाती है। जब तृष्णा नष्ट हो जाती है तो जीव मुक्त हो जाता है / बौद्ध विद्वानों का आत्मदर्शन से तात्पर्य अहंकार से है, और अनात्मदर्शन का अर्थ सरलता और नम्रता से है। वे मानते हैं अहंकार का विलय ही मुक्ति है क्योंकि अहंकार से ही तृष्णा बढ़ती है // 460 / / न ह्यपश्यन्नहमिति, स्निह्यत्यात्मनि कश्चन / न चात्मनि विना प्रेम्णा, सुखकामोऽभिधावति // 461 //
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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