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________________ योगबिंदु 262 हो तो बुद्धिरूपी दर्पण में परिणाम को कैसे प्राप्त हो सकती है? आप यह भी कहते हैं कि बुद्धि अचेतन-जड़ होने से चैतन्यभाव को प्राप्त करती है और चेतन-आत्मा-पुरुष चैतन्यभाव को छोड़कर, बुद्धि को अहंकाररूप से स्वीकार करता है / यह कैसे संभव है ? क्योंकि आत्मा सर्वथा अविकारी स्वभाव की है // 451 // तथानामैव सिद्धैव, विक्रियाऽप्यस्य तत्त्वतः / चैतन्यविक्रियाऽप्येवमस्तु ज्ञानं च साऽऽत्मनः // 452 // अर्थ : उस प्रकार से (स्फटिक दृष्टान्त से) तो इसकी (आत्मा की) विकृति (परिणामित्व स्वभाव) ही वस्तुत : सिद्ध हुई, इस प्रकार चैतन्य विकृति (परिणामित्व) सिद्ध होने पर आत्मा का ज्ञान सिद्ध हुआ / अर्थात् तथाप्रकार से आत्मा और प्रकृति का परिणामित्व स्वभाव सिद्ध हुआ, जहाँ परिणामी स्वभाव हो वहाँ विकार सिद्ध है और आत्मा का ज्ञान स्वभाव भी सिद्ध हुआ // 452 / / विवेचन : उस प्रकार से स्फटिक का दृष्टान्त देकर तुम सांख्यों ने स्वयं ही यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति और पुरुष (जड़-चेतन) दोनों में परिणामित्व स्वभाव अर्थात् नये-नये परिणामरूप पर्यायों को धारण करने का स्वभाव अवश्य होता है। परिणामी स्वभाव जहाँ होता है वहाँ विकार स्वतः सिद्ध हुआ, क्योंकि तुम मानते हो कि जब बुद्धि में आत्मा-पुरुष का प्रतिबिम्ब पड़ता है तो बुद्धि चेतन जैसी लगती है, और आत्मा प्रधान प्रकृति जैसी लगती है। तुम्हारी यही बात सिद्ध करती है कि दोनों में परिणामित्वरूप पर्याय रहे हुये हैं / तुम चैतन्य को बुद्धि में बिम्बाकार विकृत होकर प्रकट हुई मानते हो / इस प्रकार जिसका गुण विकारभाव को प्राप्त करे उस गुण के साथ तादात्म्यभाव से रहा हुआ गुणी आत्मा भी विकारभाव को पाया हुआ ही सिद्ध हुआ / अतः ज्ञानरूप गुण से अर्थ का संवेदनज्ञान सिद्ध हुआ // 452 // निमित्ताभावतो नो चेन्निमित्तमखिलं जगत / नान्तःकरणमिति चेत्, क्षीणदोषस्य तेन किम् ? // 453 // अर्थ : यदि निमित्त के अभाव से (मोक्ष में ज्ञान नहीं, ऐसा कहो तो) अखिल जगत (ज्ञेयरूप से ज्ञान का निमित्त है; यदि अन्तः करण के अभाव से (मोक्ष में ज्ञानाभाव) कहो, तो क्षीणदोष को उस (अंत: करण) से क्या प्रयोजन ? / / 453 // विवेचन : यह जो कहा जाता है कि मोक्ष अवस्था में ज्ञान का अभाव होता है, क्योंकि ज्ञान के साधनों का मोक्ष में अभाव होता है / तो उन्हें उत्तर देते हुये कहते हैं कि अगर निमित्त का अभाव होने से उसके कार्यरूप ज्ञान का अभाव मोक्ष अवस्था में सांख्य मानते हैं, तो सारा जगत ज्ञेयरूप से ज्ञान का निमित्त कारण विद्यमान है / निमित्त रूप सहकारी कारणों के अभाव
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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