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________________ 250 योगबिंदु आत्मा भी किसी भी वस्तु को जान नहीं सके। इसलिये कहा है : “न च वक्तव्यं संविद् वास्य न भविष्यति" आत्मा को ज्ञान नहीं होता, ऐसा नहीं बोलना चाहिये / क्योंकि इस संविद् ज्ञान से बाह्य-रूप-रस-गन्ध-स्पर्श शब्द आदि और आभ्यन्तर-सुख दुःख आदि जिन-जिन विषयों का संयोग-सम्बंध होता है उसे आत्मा जानता है। मैं सुखी या दुःखी हूं, यह हरा, यह पीला, यह लाल, यह कड़वा और यह तीक्ष्ण है आदि इस प्रकार का बाह्य और अभ्यन्तर विषयों का अनुभव सर्व जीवात्मओं को अवश्य होता है / इसलिये आत्मा से संविद्-ज्ञान भिन्न नहीं, अभिन्न ही है॥४३०॥ अग्नेरुष्णत्वकल्पं तज्ज्ञानमस्य व्यवस्थितम् / प्रतिबन्धकसामर्थ्यान्न स्वकार्ये प्रवर्तते // 431 // अर्थ : इस (आत्मा) का वह ज्ञान अग्नि में उष्णत्व के समान रहा हुआ है / प्रतिबंधक के सामर्थ्य से वह (ज्ञान) अपने कार्य में प्रवृत्त नहीं होता // 431 // विवेचन : जैसे उष्णत्व गुण, अग्नि का स्वाभाविक गुण है, उसे अग्नि से अलग नहीं किया जा सकता / उसी प्रकार आत्मा में चैतन्य याने ज्ञान-केवलज्ञान, केवलदर्शन सत्ता से संपूर्ण विद्यमान है और आत्मा से उसे अलग नहीं किया जा सकता / परन्तु प्रश्न उठता है कि अगर आत्मा में केवलज्ञान और केवलदर्शन अभिभाव से रहे हुये हैं, तो आत्मा सदा सभी पदार्थों का ज्ञाता, सभी भावों को जानने और देखने वाला होना चाहिये ? हमें इसका अनुभव क्यों नहीं होता? हम इन्द्रियों से अगोचर पदार्थों को जानते नहीं, देखते नहीं / इसका समाधान करते हैं कि प्रतिबंधक के सामर्थ्य से अर्थात् ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और वीर्यान्तराय आदि कर्मों के गाढ़ आवरण-पर्दे आत्मा की ज्ञान, दर्शन और चारित्ररूप सहजशक्ति को आच्छादित करके- रखे हुये हैं; उसके ज्ञानादि गुणों के उपर कर्मों के मजबूत पर्दे पड़े हैं, इसलिये आत्मा की जो ज्ञानरूपशक्ति है वह अपना कार्यसभी वस्तुओं को जानना और देखना रूप कार्य को करने में असमर्थ होती है / आत्मा के ज्ञान, दर्शन और चारित्ररूप गुण अपना कार्य नहीं कर सकते / परन्तु जब प्रतिबंधक सामग्रीरूप आवरण समूलतः नष्ट हो जाते हैं, तब आत्मा की जो सहजशक्ति केवलज्ञान और दर्शन, प्रकट होते हैं और उससे वह सर्व अतीन्द्रिय पदार्थों को भी हस्तामलकवत् साक्षात देखता है // 431|| इसी बात की पुष्टि के लिये वे अगले श्लोक में व्यतिरेक शैली से समझाते हैं : ज्ञो ज्ञेये कथमज्ञः स्यादसति प्रतिबन्धके / दाह्येऽग्निर्दाहको न स्यात्, कथमप्रतिबंधकः // 432 // अर्थ : प्रतिबंधक न हो तो ज्ञाता ज्ञेय के विषय में अज्ञात क्यों-कैसे रहे ? अप्रतिबंधक अग्नि बाह्यपदार्थों को जलाये बिना कैसे रहे ! // 432 / /
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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