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________________ 245 योगबिंदु विवेचन : योगी को योग की अनेक विचित्र अवस्थाओं का अनुभव होता है,इसलिये सभी योगियों ने अपनी-अपनी अनुभूति के आधार पर फल स्वरूप उन-उन अवस्थाओं को सूचित करने वाले भिन्न-भिन्न नाम दिये हैं / महर्षि पतञ्जलि ने अपने पातञ्जलदर्शन में असंप्रज्ञात समाधि को "धर्ममेघ" नाम दिया है। सांख्यदर्शनकार कपिलमुनि ने इसे "सत्त्वानन्द" कहा है। वेदान्त दर्शन में इसे "परमानन्द" कहते हैं और जैन इसे "शिवोदय" कहते हैं / कोई इसे "भवशक" कहते है तो कोई इसे "परसमाधि" के नाम से पुकारते हैं / यद्यपि ये नाम भिन्न-भिन्न दिखाई देते हैं परन्तु उसका वक्तव्यार्थ भिन्न नहीं है क्योंकि योग की शक्ति अति विचित्र है। अत: उसके फल स्वरूप ये नाम भिन्न-भिन्न हैं / "धर्म मेघ" - मेघ जैसे सृष्टि को शीतलता प्रदान करता है वैसे ही इस अवस्था में योगी के सभी त्रिविध - ताप और तृष्णा दूर हो जाती है और चित्त में परमशान्ति की धारा प्रवाहित होती है / "अमृतात्मा" - जिस अवस्था को पाकर आत्मा अमर हो जाती है / "भवशक" - जैसे शक ने अपने वज्र के द्वारा दैत्यों के स्थान-पर्वतों का नाश करके, दैत्यों को नष्ट किया, वैसे ही जिस योगी ने संसार के बीजभूत कर्मदलों का नाश ज्ञान, दर्शन और चारित्र रूपी वज्र से किया उस कर्मरहित स्थिति का उपभोक्ता "भवशक" है / जब आत्मा शुद्ध-बुद्ध होता है तब ध्यान, ध्येय और ध्याता एक हो जाता है, इसलिये यहाँ ध्येता का नाम "भवशक" दिया है। "सत्त्वानन्द" - प्राणों को आनन्द देने वाली स्थिति / "शिवोदय" - शिव-कल्याण और उसका उदय "शिवोदय", "परसमाधि" अन्तिम स्थिति / इस प्रकार यहाँ अध्यात्मयोग में अर्थ के अनुसार सभी का समावेश हो जाता है / शब्द से भिन्न होने पर भी सभी एक ही अर्थ के सूचक हैं / जैसे एक ही जल को वारि, पय, अम्ब, पानी आदि नामों से बोला जाता है, उसी प्रकार योगियों ने उसी वस्तु को भिन्न-भिन्न नाम दिये हैं // 422 / / मण्डूकभस्मन्यायेन, वृत्तिबीजं महामुनिः / / योग्यतापगमाद् दग्ध्वा, ततः कल्याणमश्नुते // 423 // अर्थ : महामुनि मंडूकभस्म न्याय से सर्ववृत्तिरूप बीज को जलाकर, योग्यतानाश के पश्चात् कल्याणपद (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं // 423 / / विवेचन : जिस प्रकार मेंढक के चूर्ण की भस्म करने के पश्चात् पानी का संयोग होने पर भी उसमें से मेंढक की उत्पति संभव नहीं, उसी प्रकार उच्च गुणस्थान पर स्थित योगी जब अपनी सर्ववृत्तियों-मन, वचन और काया के व्यापारों को निरुद्ध करता है, तब कर्मों का बीज नष्ट हो जाता है। आत्मा और कर्म के संयोग की जो योग्यता है, उसका नाश हो जाता है / फिर योगी पुनर्जन्म के चक्र में कभी नहीं आता / वह परम कल्याणपद मोक्ष को प्राप्त करता है / मंडूकभस्म न्याय - मेंढक के शरीर को चूर्ण में जब नये पानी का संयोग-सम्बंध होता
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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