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________________ 242 योगबिंदु परमभाव रूप करुणा का हेतु होती है / अर्थात् यह परम करुणा यथावस्थित वस्तु के बोध से पैदा होती है / जगत में चेतन और अचेतन पदार्थों के गुण, पर्याय, स्वभाव की जो परिणतियां उसमें विद्यमान हैं, उनके संपूर्ण ज्ञाता बनने में विशेष प्रकार का जो क्षयोपशमभावमय सम्यक् ज्ञान है उसमें हेतुता रही हुई है, ऐसे ज्ञान के कारण ही करुणा उत्पन्न होती है / ऐसी उत्तम भाव प्रधान करुणा तीर्थंकर, गणधर तथा अप्रमादभाव से पालने वाले चारित्रनिष्ठ योगियों में सदा रहती है। ऐसी भावकरुणा अनेक पामर जीवों के अनन्त महापापों का नाश करने में कारणभूत होती है / करुणा का ऐसा सुन्दर स्वभाव है / इस करुणारूप भावदया से पाप के हेतुभूत जो मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग आदि जिस परिणाम से पैदा होते हैं, उस परिणाम की तीर्थंकर, गणधर, आदि महामुनियों में अभावरूप अकरणता रहती है, उस अकरणता का यह श्रेष्ठ करुणारूप, भावदया में अवश्य हेतु रहा हुआ है / ऐसा वीतराग परमात्मा-सर्वज्ञ-केवली, जो सूक्ष्मदर्शी कहलाते हैं उन्होंने कहा है। भगवान महावीर स्वामी की जो करुणादृष्टि है वह अनेक हिंसादि से पापकर्म में रत बने हुये, अत्यन्त क्रोध से अभिभूत, चंडकौशिक नामक दृष्टिविष महासर्प के उपर पड़ने से वह कितना शान्त, सौम्य, निष्पाप बन गया था। उसके समस्त क्लिष्ट कर्म नष्ट हो गये। ऐसी परम-श्रेष्ठ करुणा सर्वपाप की अकरण (भाव का अकारण) कही जाती है। वह निश्चित ही पापकर्म नष्ट करने में निमित्त बनती हैं // 418 // समाधिरेष एवान्यैः, संप्रज्ञातोऽभिधीयते / सम्यक् प्रकर्षरूपेण, वृत्त्यर्थज्ञानतस्तथा // 419 // अर्थ : इस समाधि योग को अन्य दर्शनकार संप्रज्ञातयोग कहते हैं, कारण कि जिसमें यथार्थ उत्कृष्ट रूप से युक्त पर्याय विद्यमान है ऐसे ज्ञानयुक्त यह समाधि है // 419 // विवेचन : उपर्युक्त जो अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्तिसंक्षय रूप योग के पांच भेद कहे हैं, इसमें चौथे समता-योग को महर्षि पतञ्जलि आदि अन्य मतार्थी योगियों ने संप्रज्ञात समाधि योग कहा है, क्योंकि इस समतायोग में वस्तु स्वरूप का यथार्थज्ञान स्पष्टतः विद्यमान है। उसके योग से संवितर्क अर्थात् प्रत्येक द्रव्य में गुण एवं पर्याय की विद्यमानता है। उसी के भेदप्रभेद की सविकल्प विचारणारूप, शुक्ल ध्यान के प्रथम चरण की प्रवृत्ति चलती है। उसके द्वारा नर, नारक, तिर्यंच, देव आदि आत्माओं का तथा द्वीप, समुद्र इत्यादि की हानि-वृद्धि रूप. ज्ञान के विकल्प उत्कृष्टभाव से विद्यमान है। ऐसी अत्यन्त सूक्ष्म भावना-विचारों की वृत्ति, पूर्ण तत्त्वज्ञान के योग से ही होती है / आत्म स्वरूप और परमात्म स्वरूप के अभेदरूप ज्ञान, गुण, पर्याय की एकत्व भावरूप अवितर्क समाधिरूप शुक्लध्यान का दूसरा भेद ध्यान करते हैं, इसलिये यह समाधि राग-द्वेष का क्षयरूप समतामय होने से संप्रज्ञात समाधि योग कहा जाता है // 419 //
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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