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________________ योगबिंदु 241 कारणता होने पर ही आत्मा चार गति और चौरासी लाख योनि में जन्म मरण करते है और जहाँ अशुभक्रिया-मिथ्यात्वादि में कर्म, नियति, योग्यता तथा स्वभाव को अकारणता - योग्यता का अभाव हो जाय तो नरक, तिर्यंच, नर, देव आदि के जन्म-मरण का भी अवश्य अभाव हो जाता है, याने आत्यंतिक मृत्यु रूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है / परन्तु यदि अकारण याने जहाँ मिथ्यात्वादिक की अकरणता और कारणता योग्यता आदि है, उसका नियम-निश्चयभाव न माने तो अकरणयोग से जैसे आत्यन्तिक मृत्यु-मोक्ष प्राप्त होता है और मुक्तात्मा को पुन: नरक, तिर्यंच, नर, देवगति में जन्म मरण पुनः-पुनः जो होगा वह अकारण योग में तथाप्रकार की योग्यता के अभाव में जन्म-मरण का भी अभाव होता है / और जहाँ मिथ्यात्वादिक की कारणता (करणपना) विद्यमान होता है, वहाँ बार-बार जन्म, मरण, जरा, आधि, व्याधि, उपाधि भी निश्चित होती है, उसका भी अगर अनियतभाव माने अर्थात् तथाप्रकार की योग्यता को स्तर न माने, तो मुक्ति भी असंभव हो जाती है। और बारबार चौरासी लाख योनि में भ्रमण का भी प्रसंग उपस्थित होता है / इसलिये पुरुषार्थ के साथ अन्य योग्यता आदि कारणों को भी अवश्य मानना चाहिये / वही सत्य न्याय है। योग्यता की अनियतता से संसार भ्रमण का भी अभाव हो जाता है, इसलिये हे वादिओं ! आत्मा को संसार भ्रमण में तथा मोक्ष में तथाप्रकार की योग्यता आदि को सत्यन्याय युक्ति से विचारे तो करण तथा अकरण की योग्यता के विषय में वीतराग परमात्मा प्रणीत आगमशास्त्रों में देखना चाहिये, ताकि सत्य, न्याय युक्ति से अनुमान, अर्थापत्ति, उपमान आदि प्रमाणों से संसार में रहने की प्रवृत्ति सहेतुक-सकारण है और उस हेतुरूप करण का जब अभाव अकरणभाव होता है वहाँ आत्यन्तिक अन्तिम मृत्यु याने पुनः जन्म मरण का अभाव एवं परम अव्याबाध सुख की प्राप्ति होती है // 417 / / हेतुमस्य परं भावं, सत्त्वाद्यागोनिवर्तनम् / प्रधानकरुणारूपं, बुयते सूक्ष्मदर्शिनः // 418 // अर्थ : शत्रु तथा मित्र आदि प्राणियों के पापमय विचारों का नाश हो जाय, ऐसी परम उत्कृष्ट श्रेष्ठ करुणा ही इस करणयोग के परमभाव रूप करुणा का हेतु होता है, ऐसा सूक्ष्मदर्शी महापुरुषों ने कहा है // 418 // विवेचन : सर्व सत्त्व-प्राणी मिथ्यात्व आदि कारणों से आठों कर्मबंधों से चारो तरफ से घिरे हुये हैं। पापकर्म हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन, व्यभिचार, परिग्रह आदि में फंसे हुये संसार चक्र में भटक रहे हैं / उसमें कुछ प्राणी शत्रुभाव को धारण किये हुये हैं, कुछ मित्रभाव को भी धारण किये हुये हैं। कुछ लोग उपदेशों के प्रति उपाधि पैदा करने वाले भी होते हैं, और कुछ उदासीन भाव को धारण करने वाले भी होते हैं / ऐसे सभी प्राणियों के अशुभपरिणति से बंधे हुये समस्त अपराध एवं पापमय विचारों का नाश हो जाय, ऐसी परम उत्कृष्ट श्रेष्ठ करुणा इस करणयोग के
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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