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________________ 230 योगबिंदु अनुसार प्रातः, दोपहर और सायं तीनों संध्याओं के समय तीन बार, बराबर काल का समुचित ध्यान रखकर, क्रम सहित प्रणिपात पंचांग खमासमण और दण्डकादि से युक्त देववन्दन होने चाहिए / देववन्दन में जो सूत्र बोले जाते है; उनके शब्दों का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिये ताकि अर्थ अनुगत हो सके-स्पष्ट हो सके / वह अन्य को उपसंमोहजनक होनी चाहिये / प्रभु की स्तुति, स्तवनादि इतनी शान्ति से और युक्त स्वर - मध्यमस्वर से एवं मधुरता से गाया जाना चाहिये कि पास में बैठे साधकों को किसी प्रकार से बाधक न बने / वे श्रद्धा और वैराग्य गर्भित हो / देवादिवन्दन करते-करते भक्तिरस इतना उल्लसित हो उठे कि शरीर के रोम-रोम खड़े हो जायें / भावविभोर कर देने वाला, (सतत शुभभावों में वृद्धि करने वाला) प्रतिक्षण शुभाशय को बढ़ाने वाला, परमात्मा के प्रति खूब आदर बहुमान सहित अवनाम-यथाजातादि मुद्रा से संशुद्ध देवादिवन्दन यहाँ पर इष्ट है। जिस देवादिवन्दन में भावों का उद्रेक, क्रिया की शुद्धि, उच्चारण की स्पष्टता और हृदय की पवित्रतादि उपर्युक्त तत्त्व विद्यमान हैं, ऐसा उपरोक्त देवादिवन्दन अध्यात्मकोटि में आता है, अन्य नहीं // 398-399 // प्रतिक्रमणमप्येवं, सति दोषे प्रमादतः / तृतीयौषधकल्पत्वाद्, द्विसन्ध्यमथवाऽसति // 400 // अर्थ : इस प्रकार प्रमादवश दोष होने पर प्रतिक्रमण भी दोनों काल करना चाहिये / दोष न होने पर भी (करना) वह तृतीय औषधि के समान (कल्याणकारी) है // 400|| विवेचन : इसी प्रकार - देवादिवन्दन न्याय के अनुसार प्रमादवश पांच समिति, तीन गुप्तिरूप आठ प्रवचन माता में और गुरु के विनय आदि भंग का दोष लग जाने पर छ: आवश्यकरूप प्रतिक्रमण भी दोनों काल, प्रातः और सायं को करना चाहिये / इससे सभी दोष दूर हो जाते हैं और कभी दोष या प्रमाद न हुआ हो तो भी तीसरी औषधि के समान लाभदायी ही होता है। औषधियाँ तीन तरह की मानी जाती है - (1) एक औषधि वह होती है जो रोग हो, तो उसका नाश करती है परन्तु रोग न हो तो रोग पैदा करती है / (2) दूसरी औषधि वह होती है जो रोग हो, तो मिटा देती है, परन्तु रोग न हो तो लाभ हानि कुछ नहीं करती और (3) तीसरी औषधि वह होती है जो रोग हो तो मिटा देती हैं, परन्तु रोग न हो, तो नुकसान तो नहीं करती, अपितु तुष्टि, पुष्टि, बल, शक्ति और तेज बढ़ाती है / ग्रंथकार ने प्रतिक्रमण को तीसरी औषधि की उपमा देकर बताया है कि दोनों समय प्रतिक्रमण करना चाहिये / प्रतिक्रमण भी पूर्वोक्त देवादिवंदन की विधि बताई है, वैसे पवित्र भावों से करना चाहिये / इस तरह करने से दोष नाश होंगे अगर दोष न हुये तो गुणों की वृद्धि होगी और कल्याणकारी होगा /
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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